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कोई नहीं रखवाला, ये अपनी पाठशाला

Wed, 30 Nov 2016 02:30 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Wed, 30 Nov 2016 02:30 AM IST
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No keeper, this for our school
सरकारी स्कूल - फोटो : self
बुनियादी शिक्ष्‍ाा के नाम पर करोड़ांे खर्च के बाद भी सुविधा और संसाधनों की खस्ताहाली जानकर आप सिर पकड़ लेंगे। शहर हो या गांव, कहीं भी हालात दुरुस्त नहीं। इक्का-दुक्का स्‍कूलों को छोड़ दें तो बाकी सरकारी प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक स्कूलों में कहीं भवन जर्जर तो कहीं शौचालय नदारद। जिन स्कूलों में शौचालय हैं, वहां या तोे ताले लगे हैं या फिर इतनी गंदगी कि सांस लेना मुश्किल। टेबल-कुर्सी तो बच्चों के लिए सपना बन गए हैं। चाहे तपती गर्मी हो, बारिश हो या कड़कड़ाती ठंड, इन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए या तो टूटी-उखड़ी फर्श है या फिर टाट पट्टियां, दरी और चटाई। कई स्कूलों के भवन इतने जर्जर कि वो बच्चों के लिए खतरों की पाठशाला बन गए हैं। बेकार घोषित हो चुके ऐसे तीन-चार भवनों में अब भी विद्यालय संचालित हो रहे हैं। विभागीय उच्चाधिकारी और सरकार के दावे दम तोड़ते नजर आते हैं। जानकारों का कहना है कि जितनी रकम सरकारी प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक विद्यालयों पर खर्च की जा रही है, उसके आधे का भी सदुपयोग हो तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।
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ये तो महज कुछ उदाहरण हैं...। जिले में शहर से गांव तक अधिकतर सरकारी प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों का हाल कमोबेश ऐसा ही है। प्राथमिक विद्यालय आदित्यनगर तक जाने का रास्ता ही नहीं है। अभी बोरिंग हुई लेकिन पानी गंदा ही आता है। शहर के बीच स्थित प्राथमिक विद्यालय शिवपुरवा में बच्चों की संख्या के अनुरूप जगह ही नहीं है। दो कमरे हैं और बाहर दालान तक बच्चे पढ़ते हैं। टॉयलेट है तो पानी की समस्या है। स्कूल के बाहर गंदगी का अंबार इतना कि पल भर खड़े होना मुश्किल है। मुस्लिम बाहुल्य बड़ी बाजार स्थित प्राथमिक विद्यालय माताप्रसाद के गेट के दोनों तरफ ट्रांसफार्मर लगे हैं। आए दिन ट्रांसफार्मर के फुंकने और चिंगारी निकलने से बच्चों के लिए खतरा बना रहता है। स्कूल की छुट्टी के बाद वहां जुआरियों का कब्जा हो जाता है।
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