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नृसिंह लीला: पांच पीढ़ियों के पात्रों ने सजाई क्षीरसागर की झांकी, पांच दिवसीय लीला का हुआ शुभारंभ

Sun, 19 May 2024 04:05 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sun, 19 May 2024 04:05 AM IST
सार

Varanasi News: नृसिंह चतुर्दशी पर ही नृसिंह लीला के प्राचीन मुकुट का दर्शन होता है। मोहित उपाध्याय ने बताया कि यह मुकुट गोस्वामी तुलसीदास मंदिर में रखा है। इसी मंदिर स्थल पर तुलसीदास जी साधना किए थे।

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Narasimha Leela Characters five generations decorated the tableau of Kshirsagar
नरसिंह लीला के प्रथम दिन क्षीरसागर का झांकी का मंचन हुआ। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी की प्राचीन नृसिंह लीला शनिवार को क्षीरसागर की झांकी से शुरू हुई। प्रह्लादघाट पर झांकी के दर्शन के लिए देर रात तक लीलाप्रेमियों की भीड़ उमड़ी रही। भगवान विष्णु के जयघोष से घाट गूंजता रहा। क्षीर सागर की झांकी और जय-विजय के श्राप का मंचन हुआ। श्रद्धालु देख भाव विभोर हो गए। नृसिंह रामायण से लीला का मंचन हुआ। चार से पांच पीढि़यों के पात्रों ने क्षीरसागर की झांकी सजाई।

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पांच पांच दिवसीय नरसिंह लीला को देर रात शुरू हुई। प्रह्लाद घाट पर स्थित प्रह्लादेश्वर महादेव और भगवान नृसिंह मंदिर में दर्शन पूजन के बाद लीला की शुरुआत हुई। रामायणियों ने नृसिंह रामायण की छंद, चौपाई के जरिए एक-एक प्रसंग का प्रभावी वर्णन किया। वहीं, पात्रों ने बखूबी इसका वाचन करते हुए लीला की भव्यता को और उभारा। 
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गंगा में बजड़े पर सजी क्षीरसागर की दिव्य व भव्य झांकी देखते बन रही थी। देर शाम से ही दूर-दराज से आए लीलाप्रेमी घाट पर पहुंचने लगे थे। रात में 11 बजे के बाद भगवान विष्णु की नारायण झांकी नाव पर सवार होकर जब प्रह्लाद घाट पर पहुंची तो सीढ़ियों पर बैठे लोग भगवान विष्णु व हर हर महादेव के जयघोष से पूरा घाट गूंज उठा। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग के फन के नीचे सोए हुए थे और माता लक्ष्मी उनके साथ विराजमान थीं। 
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भगवान विष्णु आकर्षक वस्त्र और कलावती गहने धारण किए हुए थे। वहीं, माता लक्ष्मी शृंगार कर उनके चरणों के पास विराजमान थी। भगवान विष्णु क्षीरसागर में विश्राम कर रहे थें। तभी उनसे मिलने की इच्छा लिए आए ऋषियों को द्वारपाल जय और विजय ने रोक दिए। 



इससे कुपित होकर ऋषियों ने द्वारपालों को जन्म-जन्मांतर तक राक्षस योनी में पैदा होने का श्राप दिए। मगर द्वारपालों द्वारा काफी अनुनय-विनय करने के बाद ऋषियों ने उनको तीन जन्मों तक ही राक्षस योनी में जन्म लेने के बाद मुक्ति मिलने का आशीर्वाद दिया। इसके बाद उनका हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकश्यप के रूप में जन्म हुआ। प्रमुख पात्रों में अनमोल त्रिवेदी (भगवान विष्णु), देवराज त्रिपाठी (लक्ष्मी जी) तथा शुद्धू (जय) और बुद्धू (विजय) रहे।


रामायणी के रूप में मल्लू केसरी, मोहित मिश्र, कृष्णकांत त्रिपाठी, दम साहनी रहे। पांच दिवसीय लीला के दूसरे दिन रविवार को वाराह अवतार, हिरण्याक्ष वध, भक्त प्रह्लाद का जन्म की लीला होगी।

दक्षिण भारत के साधकों व श्रद्धालुओं ने देखी भी लीला
नृसिंह लीला को दक्षिण भारत के साधकों व श्रद्धालुओं ने और विस्तार दिए थे। उन्होंने काशी प्रवास के दौरान प्रह्लाद घाट पर होने वाली इस लीला को देखते थे। उन्होंने खुद इसको संरक्षित करने नृसिंह रामायण की रचना की।

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