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महाकुंभ: पितरों का श्राद्ध और खुद का पिंडदान कर बनेंगे आठ हजार संन्यासी, जानें- संन्यासी बनने की प्रक्रिया

Fri, 20 Dec 2024 04:10 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Fri, 20 Dec 2024 04:10 PM IST
सार

Maha Kumbh 2024 : कुंभ मेले में काशी समेत विभिन्न प्रांतों से नागा साधु और ब्रह्मचारी बनाए जाएंगे। इसमें काशी से दो हजार संन्यासी बनेंगे। 

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Maha Kumbh 2025 Eight thousand saints will become saints by performing shradh and pind daan
काशी में गंगा घाट किनारे बैठे साधु। - फोटो : संवाद

विस्तार

महाकुंभ अब अपने शंखनाद की ओर बढ़ रहा है। धर्म ध्वज फहराने के साथ पेशवाई का सिलसिला शुरू हो गया है। इसके साथ ही संन्यास के कठिन तप से गुजरने के लिए श्रद्धालु गुरु चरण में अर्जी लगा रहे हैं। वह अपने पितरों का श्राद्ध और खुद का पिंडदान करेंगे। 

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विविध अनुष्ठान के साथ 24 घंटे निराहार रहकर संन्यासी जीवन धारण करेंगे। इस दौरान आठ हजार से अधिक श्रद्धालुओं को 13 अखाड़े साधु-संत और ब्रह्मचारी बनाएंगे। काशी से भी करीब दो हजार श्रद्धालु संन्यासी बनेंगे। नागा साधु, संत और ब्रह्मचारी बनाने का काम अखाड़े बनाते हैं।
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अर्धकुंभ और महाकुंभ में लोग सबसे ज्यादा संन्यास ग्रहण करते हैं। इस बार भी महाकुंभ में देशभर से नागा साधु से लेकर ब्रह्मचारी बनाए जाएंगे। हर अखाड़े अलग-अलग शुभ मुहूर्त में उनका संन्यास ग्रहण करवाएंगे। 
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श्रीशंभू पंचदशनाम आह्वान अखाड़ा के श्रीमहंत बटेश्वर भारती महाराज ने बताया कि अखाड़े के नियमों के अनुसार सभी अनुष्ठान पूरे कराने के बाद ही उन्हें संन्यास धारण करवाया जाता है। इस दौरान अखाड़ों की पदवी भी दी जाती है। 

जूना अखाड़े के प्रबंधक दिनेश मिश्र ने बताया कि अखाड़े की चार मढ़ियों के महंत संन्यासी बनने की प्रक्रिया पूरी कराते हैं। रात में अखाड़े के अंदर सभी विजया हवन करते हैं। अखाड़े की ओर से कुंभ में संन्यास दीक्षा के अनुष्ठान शुरू हो गए हैं।

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संन्यासी बनने की ये है प्रक्रिया

पंच परमेश्वर की संस्तुति के बाद इष्टदेव पूजन होता है। मुंडन, गंगा स्नान, पितरों का श्राद्ध व खुद का पिंडदान किया जाता है। देवी-देवता का स्मरण कर जनेऊ व दंड धारण, विजया हवन होता है। रात में गंगा में दंड व जनेऊ विसर्जन के बाद महामंडलेश्वर उन्हें दीक्षा देते हैं। इस दौरान 24 घंटे व्रत रखा जाता है। शरीर पर भगवान शिव का अखंड भस्म लगाते हैं। 24 घंटे महावाक्य का जप करते हैं। इसके बाद रुढाथ की कंठी धारण कराई जाती है।

अखाड़े करते हैं पते की तस्दीक
अब संन्यासी जीवन धारण करवाने के लिए आधार देखा जाता है। अखाड़े उनके नाम पत्ता आदि की तस्दीक करने के बाद ही उन्हें दीक्ष देते हैं। बटेश्वर भारती महाराज ने बताक उनके नाम व फछ सही नहीं पाया गया और वह गलत प्रकृति का है तो उसे सन्यास धारण नहीं कराते। 

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