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काशी विश्वनाथ मंदिर में ई-पूजा पर सीएम योगी को दी गई गलत जानकारी

Mon, 01 May 2017 05:09 PM IST
amarujala.com- Written by: अनूप ओझा
amarujala.com- Written by: अनूप ओझा Updated Mon, 01 May 2017 05:09 PM IST
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Kashi Vishwanath temple Online donation and e-ticketing become Defect
काशी विश्वनाथ मंदिर - फोटो : amarujala

काशी विश्वनाथ मंदिर में ऑनलाइन दान और ई-टिकटिंग की नौ साल पुरानी व्यवस्था के बारे में श्रद्धालु जानते ही नहीं हैं। ऑनलाइन दान का प्रचार-प्रसार नहीं किया जाने की वजह से ई-डोनेशन से दो साल में मिलने वाला एक-एक करोड़ रुपये का दान (चढ़ावा) 36 लाख रुपये तक आ गया है।

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अब ई-प्रोजेक्ट पर धर्मार्थ कार्य विभाग ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अंधेरे में रखने की कोशिश की है। नतीजा, विभाग के अफसरों की सलाह पर सीएम ने मंदिर में ऑनलाइन डोनेशन और ई-पूजा की व्यवस्था लागू करने की घोषणा कर दी।
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काशी विश्वनाथ मंदिर में ऑनलाइन दान के अलावा मंगला आरती, रुद्राभिषेक के लिए टिकट जारी करने की व्यवस्था जनवरी, 2008 में शुरू हुई थी। काशी विश्वनाथ मंदिर की वेबसाइट www.shrikashivishwanathmandir.org के जरिए 2008 से 2010 तक ऑनलाइन डोनेशन और टिकट से मंदिर को करीब एक करोड़ रुपये का दान मिलता था।
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2013 में ई-डोनेशन के रूप में बाबा के हैदराबाद निवासी भक्त विजय ने 60 लाख रुपये ऑनलाइन दान में दिए थे। वेबसाइट पर ई-पूजा की भी सुविधा थी। वेब पेज पर ई-पूजा के लिए एक क्लिक में ही बाबा का विग्रह आ जाता था और श्रद्धालु घर बैठे फूल, वेल पत्र और प्रसाद अर्पित कर पूजा कर लेते थे।


दो वर्ष बाद इस वेबसाइट का संचालन बेपटरी हो गया। कहा जा रहा है कि मंदिर में सक्रिय पंडा, पुजारी और कर्मचारी नहीं चाहते कि ऑनलाइन सिस्टम काम करे। तकनीकी गड़बड़ी बताकर अक्सर वेबसाइट बंद कर दी जाती है। इसके बाद मैनुअल दान टिकट जारी होते हैं। यही नही, दान की रकम श्रद्धालुओं से पंडा, पुजारी, कर्मचारी और सेवादार अपने हाथ में ले लेते हैं।


आई भक्ति से भी हुआ था करार

बाबा विश्वनाथ की ऑनलाइन आरती, पूजा और प्रसाद बेचने के लिए मंदिर प्रशासन ने फिल्म अभिनेता डिनो मॉरियो की कंपनी आई भक्ति से करार किया था। 2014-15 में न्यास परिषद की मंजूरी के बगैर ही धर्मार्थ कार्य विभाग ने तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव से लखनऊ में इसका उदघाटन भी करवा दिया था।



बाद में न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य पं. अशोक द्विवेदी ने इसे अवैधानिक ठहराते हुए स्वीकृति नहीं दी थी। न्यास अध्यक्ष का कहना था कि किसी गैर हिंदू धर्मावलंबी को नियमानुसार विश्वनाथ मंदिर में किसी तरह की पूजा या व्यवसाय से लाभ का काम नहीं दिया जा सकता। इसके बाद शासन ने इस करार को रद्द कर दिया था।

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