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घिर आई घटा कारी-कारी डर लागे रैन अंधियारी...
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 14 Jul 2016 01:54 AM IST
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मेघ और मल्हार दोनों रागों का पावस ऋतु से गहनतम रिश्ता है। दोनों के ही स्वर पवन के मीठे के शोर, मेघों की उमड़-घुमड़, दहला देने वाली बिजली की तड़क-चमक की अनुभूति पैदा कराते हैं। दूर बसे प्रियतम से मिलन की आस विरह-वेदना पैदा करती है। अंग-अंग दहकने, सुगलने लगता है। प्रकृति उमंग-उल्लास से भरने लगती है। एक ओर कवि के मन में रागों, गीतों, छंदों का नया अंकुवा फूटने लगता है तो दूसरी ओर कंठ से मल्हार के स्वर गूंजने लगते हैं।
पावस ऋतु में मस्त हाथी चिंघाड़ते हैं। मेघों की उमड़-घुमड़ मोरों के लिए मृदंग का काम करती है। और वे नाच उठते हैं। पपीहे का पीउ-पीउ की पुकार उसके विरह को और घना बना देती है। पेड़ की डालियों पर चिड़ियों का चहकना, क्यारियों में दादुर का शोर मचाना शुरू हो जाता है। चाहे जेठ में सूखकर तपती हुई धरती हो या प्रियतम के विरह में सूख कर कांटा हुई विरहिनी। आषाढ़ के काले मेघ दोनों के लिए दोनों को तरह-तरह के धान्यों से सुशोभित करते हैं। यह कहना है बीएचयू की संगीत एवं मंच कला संकाय की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. शारदा वेलंकर का। वह कहती हैं कि आषाढ़ के मेघों के संगीत गर्मी के ताप से मरुस्थल बने जीवन को स्वरों से सींच कर इंद्रधनुष की भांति रंगीन बना देते हैं। वर्षा ऋतु के सुहावने मौसम में संगीत प्रेमियों के मन से संगीत फूटने लगता है। राग-रागिनियां और गीत निकलने लगते हैं। हृदय में हिलोरें उठने लगती हैं। हृदय की सभी कोमल भावनाएं खिलने लगती हैं। घटाओं के घिरने और प्रियतम का पास न होने की घड़ी विरह की व्याकुलता को बढ़ा देती है। ऐेसे में कंठ से मल्हार फूटता है-सजनी छाई घटा घनघोर हमरे संवरिया नहीं आए...।
सावन झर लागे धीरे-धीरे...। वह कहती हैं कि कवि प्रकृति और प्रेम-विरह की कविताएं लिखने में मग्न हो जाता है। महाकवि जायसी से लेकर सूर, तुलसी ने भी पावस ऋतु का मनोरम वर्णन किया है। तुलसीदास जब घटाओं की ओर निहारते हैं, तब कुछ अलग ही भाव प्रगट होता है। वह लिखते हैं कि-वर्षा काल मेघ नभ छाए/गर्जत लागत परम सुहाए /दामिनि दमक रही घन माही/खल की प्रीति यथा थिर नाहीं...इसी तरह वह लिखते हैं घन घमंड गरजत नभ घोरा....। लेकिन जब पावस ऋतु के रागों में यह घटाएं घिरती हैं तब बंदिश गाई जाती है-घिर आई घटा कारी-कारी डर लागे रैन अंधियारी...। आषाढ़ के बादल प्यासी धरती को तृप्त करते हैं। वह बंदिश पर आलाप लेती हैं- पिउ पिउ करे पपीहा धीर ना धरे री मां मोरवा बोलत वन में...। प्रो. वेलंकर कुछ देर के लिए गंभीर हो जाती हैं। कहती हैं कि मेघ तपड़ते जीव-जंतुओं की प्यास बुझाते हैं। सूखते वृक्षों को हरा-भरा करते हैं। इन मेघों के अभाव में अकाल पड़ जाता है। मानव और पशु काल की भेंट चढ़ने लग जाते हैं। त्राहि-त्राहि मच जाती है और फिर तो एक बारगी संसार का मानचित्र ही बदलने का डर सताने लगता है। इसलिए प्राणिमात्र के लिए जितनी उमड़ने मेघों की अनिवार्यता है, सूने जीवन में उल्लास भरने के लिए उतनी ही मल्हार की।
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पावस ऋतु में मस्त हाथी चिंघाड़ते हैं। मेघों की उमड़-घुमड़ मोरों के लिए मृदंग का काम करती है। और वे नाच उठते हैं। पपीहे का पीउ-पीउ की पुकार उसके विरह को और घना बना देती है। पेड़ की डालियों पर चिड़ियों का चहकना, क्यारियों में दादुर का शोर मचाना शुरू हो जाता है। चाहे जेठ में सूखकर तपती हुई धरती हो या प्रियतम के विरह में सूख कर कांटा हुई विरहिनी। आषाढ़ के काले मेघ दोनों के लिए दोनों को तरह-तरह के धान्यों से सुशोभित करते हैं। यह कहना है बीएचयू की संगीत एवं मंच कला संकाय की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. शारदा वेलंकर का। वह कहती हैं कि आषाढ़ के मेघों के संगीत गर्मी के ताप से मरुस्थल बने जीवन को स्वरों से सींच कर इंद्रधनुष की भांति रंगीन बना देते हैं। वर्षा ऋतु के सुहावने मौसम में संगीत प्रेमियों के मन से संगीत फूटने लगता है। राग-रागिनियां और गीत निकलने लगते हैं। हृदय में हिलोरें उठने लगती हैं। हृदय की सभी कोमल भावनाएं खिलने लगती हैं। घटाओं के घिरने और प्रियतम का पास न होने की घड़ी विरह की व्याकुलता को बढ़ा देती है। ऐेसे में कंठ से मल्हार फूटता है-सजनी छाई घटा घनघोर हमरे संवरिया नहीं आए...।
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सावन झर लागे धीरे-धीरे...। वह कहती हैं कि कवि प्रकृति और प्रेम-विरह की कविताएं लिखने में मग्न हो जाता है। महाकवि जायसी से लेकर सूर, तुलसी ने भी पावस ऋतु का मनोरम वर्णन किया है। तुलसीदास जब घटाओं की ओर निहारते हैं, तब कुछ अलग ही भाव प्रगट होता है। वह लिखते हैं कि-वर्षा काल मेघ नभ छाए/गर्जत लागत परम सुहाए /दामिनि दमक रही घन माही/खल की प्रीति यथा थिर नाहीं...इसी तरह वह लिखते हैं घन घमंड गरजत नभ घोरा....। लेकिन जब पावस ऋतु के रागों में यह घटाएं घिरती हैं तब बंदिश गाई जाती है-घिर आई घटा कारी-कारी डर लागे रैन अंधियारी...। आषाढ़ के बादल प्यासी धरती को तृप्त करते हैं। वह बंदिश पर आलाप लेती हैं- पिउ पिउ करे पपीहा धीर ना धरे री मां मोरवा बोलत वन में...। प्रो. वेलंकर कुछ देर के लिए गंभीर हो जाती हैं। कहती हैं कि मेघ तपड़ते जीव-जंतुओं की प्यास बुझाते हैं। सूखते वृक्षों को हरा-भरा करते हैं। इन मेघों के अभाव में अकाल पड़ जाता है। मानव और पशु काल की भेंट चढ़ने लग जाते हैं। त्राहि-त्राहि मच जाती है और फिर तो एक बारगी संसार का मानचित्र ही बदलने का डर सताने लगता है। इसलिए प्राणिमात्र के लिए जितनी उमड़ने मेघों की अनिवार्यता है, सूने जीवन में उल्लास भरने के लिए उतनी ही मल्हार की।
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