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Independence Day 2021: स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और बुजुर्गों ने झेली है तकलीफ, आज भी होती है बंटवारे की पीड़ा 

Sun, 15 Aug 2021 03:22 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Sun, 15 Aug 2021 03:22 PM IST
सार

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और बुजुर्गों का कहना है कि 1947 में जो तकलीफें देखी और झेली हैं, उसकी कसक आज भी है। उस दर्द की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बंटवारे की पीड़ा आज भी होती।

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Independence Day 2021: Freedom fighters and elders have suffered, even today there is pain of partition
सीताराम, जगन्नाथ प्रसाद और रामजी मोदनवाल। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आजादी की लड़ाई लड़ने वालों ने जिस गांव, शहर का सपना देखा था वह अब धीरे-धीरे साकार हो रहा है। बापू के सपनों का देश उनके बताए हुए रास्ते पर धीरे-धीरे अग्रसर है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और बुजुर्गों का कहना है कि 1947 में जो तकलीफें देखी और झेली हैं, उसकी कसक आज भी है। उस दर्द की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती है। बंटवारे की पीड़ा आज भी होती।  

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वाराणसी की राजातालाब तहसील के डीह गंजारी गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम शास्त्री (100) ने कहा कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता के उद्देश्य की प्राप्ति 1947 में हो गई थी। धीरे धीरे सपने पूरे हो रहे हैं। अभी सारे सपने पूरे होने बाकी हैं। वर्तमान में देश उसी रास्ते पर चल रहा है।
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ऐसा भारत बनाएं कि कोई गरीब न हो। जहां भ्रष्टाचार न हो। जात-पात का भेदभाव न हो। किसी प्रकार की कोई हिंसा न हो। ऐसा कृत्य न करें जिससे देश का विकास बाधित हो। मेरी कामना है कि दोबारा जन्म लूं तो फिर भारत मां की सेवा करने का मौका मिले।

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चौबेपुर निवासी जगरनाथ प्रसाद उर्फ जगई कन्नौजिया (87) ने कहा कि ब्रिटिश सरकार में काफी शोषण था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के चलते हमें स्वतंत्रता मिली है। 1947 में प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता था। गांव में लाल पगड़ी देखकर लोग भाग जाते थे। उस समय कादीपुर रेलवे स्टेशन पर चक्काजाम किया गया था। अब देश अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त हो गया है। आज लगता है कि सपना पूरा हो गया है। पहले दो जून की रोटी नसीब नहीं होती थी। अब खाने की कोई कमी नहीं है। तीन लड़के हैं, एक फौज में है। एक पुलिस और एक व्यापारी है।

चौबेपुर के ही राम जी मोदनवाल (86) ने कहा कि आजादी के बाद काफी कुछ बदल गया। पिता स्व. गंगाराम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। मेरे घर में आंदोलन की रणनीति तैयार होती थी। बर्थरा कला के बजरंगी यादव और चुकहां के श्यामाचरण पांडेय व मेरे पिता आपस में बैठकर रूपरेखा बनाते थे। उन लोगों ने आजादी के पहले कादीपुर रेलवे स्टेशन फूंका था। पहले खाने, रहने, शिक्षा, सड़क, साधन सबका अभाव था। आजादी के बाद इससे मुक्ति मिली है। पहले से देश ने काफी तरक्की की है।

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