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भारत-चीन के रिश्ते बिगड़े तो बनारसी खिलौनों की बढ़ी मांग, सालाना 30 करोड़ का है कारोबार

Thu, 27 Aug 2020 12:43 AM IST
स्‍वाधीन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Thu, 27 Aug 2020 12:43 AM IST
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Increased demand for Banarasi toys if India-China relations deteriorate
लकड़ी से बने खिलौने। - फोटो : अमर उजाला।

कई चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध के बाद अब चीनी खिलौनों पर भी प्रतिबंध लगाने की तैयारी चल रही है। बाजार से इन चीनी खिलौनों के गायब होने पर अब बनारसी लकड़ी के खिलौनों की मांग देश सहित विदेशों में भी बढ़ेगी। बनारस की काष्ठ-कला (लकड़ी से बनी मूर्तियां) पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां बने लकड़ी के तरह-तरह के खिलौनों रेलगाड़ी, गुड़िया, सिंदूरदान, चूड़ीकेस के अलावा सजावटी सामान इंटीरियर डेकोरेशन में भी काफी प्रयोग हो रहा है। इस काष्ठ कला ने दुनिया में बनारस को एक अलग पहचान दी है। 

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जीआई (जियोग्राफिकल इंडीकेशन) टैग मिलने के बाद बनारस का लकड़ी कारोबार 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है। अब और भी बढ़ने का अनुमान हस्तशिल्प जता रहे हैं। कश्मीरीगंज, खोजवां इलाके में बड़े स्तर पर लकड़ी के खिलौने बनाए जाते हैं, जबकि लहरतारा, कॉरोअमा गांव में फ्लावर पॉट, नकासी पर किए गए ऐंटीक आइटम बनाए जाते हैं। यह आइटम विदेशों में खूब पसंद किए जाते हैं।

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खोजवां है सबसे बड़ा हब 

शहर का कश्मीरीगंज इलाका लकड़ी के खिलौने बनाने का प्रमुख केंद्र माना जाता है। लकड़ी के खिलौने बनाने वाली खराद की मशीनें नवापुरा, जगतगंज, बड़ागांव, हरहुआ, लक्सा, दारानगर में भी चलती हैं। यहां तीन हजार से अधिक कारीगर जंगली लकड़ी 'कोरैया' से कई प्रकार के खिलौने तैयार करते हैं।

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खोजवां के कश्मीरीगंज में बड़े स्तर पर लकड़ी के खिलौने बनाए जाते हैं। पांच साल पहले यह कला अपने अंतिम दौर में थी, लेकिन भारत सरकार और विदेशों में बढ़ रही मांग के कारण यह कला फिर से पसंद की जाने लगी है। 
 

Increased demand for Banarasi toys if India-China relations deteriorate
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media

इंटरनेट से जम रहा काम 

बढ़ती तकनीकी ने बनारस के काष्ठ व्यवसाय को काफी हद तक बढ़ाया है। बाजार के लिए तरस रहे बनारस के खिलौनों ने अब इंटरनेट के माध्यम से दुनिया में रंग जमाना शुरू कर दिया है। समय के साथ-साथ डिजाइन और स्वरूप बदलने से बनारस के लकड़ी उत्पादों का व्यवसाय बढ़ रहा है। थोक कारोबारियों के आर्डर पर अब इस काम से जुड़े कारीगरों को काम मिलने लगा है।

अमेरिका, यूरोप तक है मांग

अब शिल्पियों ने सिर्फ लकड़ी के पारंपरिक खिलौने बनाने की बजाय उनके रंग-रूप में काफी बदलाव किया है। यही नहीं, अब यह व्यवसाय खिलौनों तक ही सीमित नहीं रहा। लकड़ी से घर की साज-सज्जा के खूबसूरत उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं। यही वजह है कि अब बनारस में बने लकड़ी के खिलौनों और इंटीरियर उत्पाद विदेशी ग्राहकों खासकर यूरोप व अमेरिका को भी लुभा रहे हैं। लकड़ी से तैयार मूर्तियां भी खासी पसंद की जाती हैं।
 

Increased demand for Banarasi toys if India-China relations deteriorate
सांकेतिक तस्वीर

एक नजर  

  • 3000 से 5000 लोग प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं इस हुनर से
  • 4000 से 5000 लोग जुड़े हैं खिलौना कारोबार से 
  • 30 से 35 करोड़ रुपये का है वार्षिक कारोबार  
  • 28 राज्यों तक जाता है यहां बना खिलौना  
  • 20 देशों में जाता है हाथ से बने लकड़ी के सामान व खिलौने

 

हस्त शिल्पियों को आर्थिक मदद मिले तो वह अपना शत-प्रतिशत योगदान देंगे। अभी तो कई दिक्कतें हस्तशिल्पियों के समक्ष हैं। जीएसटी में भी छूट मिलनी चाहिए।
प्रेम शंकर विश्वकर्मा, हस्तशिल्पी, लहरतारा

चीनी खिलौनों के बंद होने के बाद अपने यहां के खिलौनों की मांग बढ़ेगी। हालांकि इस कोरोना काल में कारोबार प्रभावित है। लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही रफ्तार पकड़ेगा।
रमेशचंद्र  विश्वकर्मा, हस्तशिल्पी, हरहुआ

तकनीकी प्रशिक्षण मिलना शुरू हो जाए तो यहां के शिल्पी एक से बढ़कर एक खिलौने बनाना शुरू कर दें। बस उन्हें थोड़ी प्रोत्साहन की जरूरत है।
अशोक कुमार शर्मा, हस्तशिल्पी, करोमा

बनारसी काष्ठ कला की पहचान दुनिया भर में है। चीनी खिलौनों को मात देने में यहां के कारीगर अव्वल है। थोड़ी सी सरकार से यदि इन उद्योगों को राहत मिल जाए, कारीगरों को ट्रेनिंग मिले तो फिर यह उद्योग उड़ान भर सकेगा। हुनर की कमी अपने यहां नहीं है।
डॉ रजनीकांत मिश्रा, पद्मश्री, जीआई एक्सपर्ट

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