{"_id":"57f563314f1c1bc332271a00","slug":"in-collaboration-with-monkey-army-at-sea-bridge","type":"story","status":"publish","title_hn":"वानरी सेना के सहयोग से समुद्र पर बना पुल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
वानरी सेना के सहयोग से समुद्र पर बना पुल
ब्यूरो, अमर उजाला/वाराणसी
Updated Thu, 06 Oct 2016 02:01 AM IST
विज्ञापन
रामनगर की रामलीला में लगा रावण का दरबार।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
यह लघु जलधि तरत कति बारा/अस सुनि पुनि कह पवन कुमारा/प्रभु प्रताप बड़वानल भारी/सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी/जामवंत बोले दोउ भाई/नल नीलहि सब कथा सुनाई/रामप्रताप सुमिरि मन माही/करहु सेतु प्रयास कछु नाही /देखि सेतु अति सुंदर रचना/बिहसि कृपानिधि बोले बचना।/ बांधा सेतु नील नल नागर/राम कृपा जसु भयउ उजागर। रामनगर की रामलीला में सिंधु तट प्रयाण, सेतु निर्माण एवं शिव स्थापना की लीला देखने के लिए लीला प्रेमियों की भीड़ उमड़ी रही। लीला का मंचन नगर के लंका क्षेत्र में हुआ।
माता जानकी के अशोक वाटिका में होने की जानकारी पाकर सुग्रीव की अगुवाई में भगवान श्रीराम की जय-जयकार करती वानरी सेना प्रस्थान कर समुद्र तट पर पहुंचती है। उधर विभीषण रावण से कहता है कि रामजी को वापस कर दीजिए जिससे कि आप का बुरा न हो। रावण विभीषण से कहता है कि तेरी मौत नजदीक आ गई है। बस यह कहकर ही उसे लात मारकर लंका से निकाल देता है। तब विभीषण रथ पर बैठकर श्रीराम के पास आता है।
इसके बाद श्रीराम समुद्र के पास जाकर आराधना करते हैं, किसी तरह तीन दिन तक अनुननय विनय करने के बाद जब समुद्र रास्ता बनाने नहीं देते हैं तो क्रोधित होकर श्रीराम धनुष उठाते हैं। चूंकि श्रीराम तरकस चढ़ा लिए थे और उसे उतारना शोभा नहीं देता, ऐसे में उन्होंने उत्तर दिशा की ओर से बाण चला दिया। इसके बाद समुद्र श्रीराम को प्रणाम कर चला जाता है। एक ओर नल नील पत्थर डालते गए और वह समुद्र में तैरता गया, देखते-देखते ही रास्ता बन गया।
विज्ञापन
उधर भगवान राम शिवलिंग की स्थापना में लग गए, प्राण-प्रतिष्ठा के बाद पूजन-अर्चन करने लगे। शिव स्थापना के बाद जब प्रभुशंकर की आरती अपने हाथ से करते हैं तो चारो तरफ हर-हर महादेव का उदघोष होने लगा और सभी श्रद्धालु उस रुप को देख नेत्र सुफल करते हैं।
विज्ञापन
माता जानकी के अशोक वाटिका में होने की जानकारी पाकर सुग्रीव की अगुवाई में भगवान श्रीराम की जय-जयकार करती वानरी सेना प्रस्थान कर समुद्र तट पर पहुंचती है। उधर विभीषण रावण से कहता है कि रामजी को वापस कर दीजिए जिससे कि आप का बुरा न हो। रावण विभीषण से कहता है कि तेरी मौत नजदीक आ गई है। बस यह कहकर ही उसे लात मारकर लंका से निकाल देता है। तब विभीषण रथ पर बैठकर श्रीराम के पास आता है।
विज्ञापन
इसके बाद श्रीराम समुद्र के पास जाकर आराधना करते हैं, किसी तरह तीन दिन तक अनुननय विनय करने के बाद जब समुद्र रास्ता बनाने नहीं देते हैं तो क्रोधित होकर श्रीराम धनुष उठाते हैं। चूंकि श्रीराम तरकस चढ़ा लिए थे और उसे उतारना शोभा नहीं देता, ऐसे में उन्होंने उत्तर दिशा की ओर से बाण चला दिया। इसके बाद समुद्र श्रीराम को प्रणाम कर चला जाता है। एक ओर नल नील पत्थर डालते गए और वह समुद्र में तैरता गया, देखते-देखते ही रास्ता बन गया।
विज्ञापन
उधर भगवान राम शिवलिंग की स्थापना में लग गए, प्राण-प्रतिष्ठा के बाद पूजन-अर्चन करने लगे। शिव स्थापना के बाद जब प्रभुशंकर की आरती अपने हाथ से करते हैं तो चारो तरफ हर-हर महादेव का उदघोष होने लगा और सभी श्रद्धालु उस रुप को देख नेत्र सुफल करते हैं।