25 साल से चल रहा अवैध नामांतरण का खेल, गोरखधंधा कई विभागों में
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले में सिर्फ ग्राम समाज ही नहीं, वन विभाग की जमीनों के भी अवैध नामांतरण का बड़ा खेल हुआ है। 1994 में सर्वे सेंटलमेंट की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी रेणुकूट वन प्रभाग एरिया की 156 में महज 28 गांवों की ही फाइलें धारा 20 के प्रकाशन के लिए भेजी गईं।
आपत्ति का दांवपेच अपनाकर इसे भी लटकाए रखा गया। इसी तरह सोनभद्र और ओबरा वन प्रभाग के भी सौ से अधिक गांवों की फाइलें लटकाई रखी गईं।
1994 के बाद रोक के बावजूद सहायक अभिलेख अधिकारी, सर्वे कानूनगो, लेखपाल और माफियाओं का गठजोड़ जमीनों के अवैध नामांतरण में जुटा रहा। उभ्भा प्रकरण के बाद अब जब वन विभाग की जमीनों के भी नामांतरण की जांच शुरू हो गई तो पूर्व के कई वन बंदोबस्त अधिकारी सहित अन्य के कार्रवाई की जद में आने की चर्चा शुरू हो गई है।
वनवासी सेवा आश्रम गोविंदपुर की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 1986 में आदिवासियों को जमीनी हक संबंधी दावे की सुनवाई के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद सर्वे सेंटलमेंट की प्रक्रिया शुरू की गई। दावों के निस्तारण के लिए वन बंदोबस्त अधिकारी और अपीलीय कोर्ट के तौर पर अपर जिला जज कोर्ट की व्यवस्था दी गई।
इसमें जो भूमि आदिवासियों के पक्ष में छोड़ी जानी थी, उसके अलावा शेष जमीन को धारा 20 के तहत अंतिम तौर पर वन भूमि दर्ज करना था। 18 जुलाई 1994 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी करते हुए कहा कि सर्वे पूरा हो चुका है। अपर जिला जज 30 सितंबर 1994 तक अपीलों पर भी फैसला ले लें।
इसके बाद भी जहां नए दावे दाखिल कर जमीनों के अवैध नामांतरण का खेल होता रहा। वहीं, सर्वे प्रक्रिया में लिए गए जिले के 433 गांवों में अधिकांश गांवों की फाइलें धारा 20 के प्रकाशन के लिए नहीं भेजी गई।
एके जैन की रिपोर्ट, एनजीटी के निर्देश की भी अनदेखी
सोनभद्र। 2015 में तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने रेणुकूट वन प्रभाग में जंगल की एक लाख हेक्टेअर जमीन लूटने की रिपोर्ट शासन को दी थी। वहीं, एनजीटी ने चार मई 2016 को ऐसे मामलों की जांच कर अवैध नामांतरण निरस्त करने के निर्देश दिए थे। बावजूद अब तक अफसर कागजी कोरमपूर्ति में ही जुटे रहे।
करोड़पतियों के रहन-सहन को मात देते हैं कई लेखपाल-अधिकारी
सोनभद्र। जिले में जमीनों के अवैध नामांतरण के खेल में कई लेखपाल-अधिकारी मालामाल हो गए। कई ने रिश्तेदारों, परिवारीजनों ने नाम दर्जनों बीघे जमीन नामांतरित करा ली। दूसरे जनपद तबादला होने के बावजूद ऊंची पहुंच का इस्तेमाल कर फिर से जिले में तैनाती पा ली। आलीशान घर-मकान बनाकर न सिर्फ यहीं के निवासी भी बन गए बल्कि पेट्रोल पंप तक खोल लिए। इसी तरह सेवानिवृत्ति के बाद भी कई अफसर यहां जमीनों को हथियाने में लगे हुए हैं।
वन प्रभाग के 156 गांवों में से 28 गांवों की फाइलें धारा बीस के प्रकाशन के लिए भेजी जा चुकी हैँ। इसमें पड़ने वाली आपत्तियों का भी समय-समय पर निस्तारण किया गया है। शेष 128 गांवों को भी धारा बीस के प्रकाशन के लिए भेजने के लिए लगातार वन बंदोबस्त अधिकारी से अनुरोध किया जा रहा है।
-एमपी सिंह, डीएफओ रेणुकूट