आईआईटी बीएचयू: मशीन लर्निंग और सूक्ष्म शैवाल से साफ होगा अपशिष्ट जल, 90 फीसदी कर सकते हैं शुद्ध
आईआईटी बीएचयू के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग ने शोध में पाया कि नदियों में गिरते नालों से 90 प्रतिशत अपशिष्ट को स्वच्छ किया जा सकता है।
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अपशिष्ट जल को साफ करने के लिए अब सूक्ष्म शैवाल और मशीन लर्निंग का उपयोग किया जाएगा। इसके प्रयोग से फोटो बॉयोरिएक्टर में सूक्ष्म शैवाल को उचित तापमान, प्रकाश तीव्रता, कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा, पीएच लेवल को निर्धारित कर अपशिष्ट जल को 90 प्रतिशत तक साफ किया जा सकता है। यह वर्तमान में बैक्टिरिया आधारित जल शोधन प्रक्रिया से बेहतर है। आईआईटी बीएचयू के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग में हुए शोध में सफलता के बाद इसका प्रकाशन भी यूएस के बायोकेमिकल आधारित जर्नल्स में हुआ है।
बॉयोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ विशाल मिश्रा ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट 2021 'वैल्यूइंग वॉटर' के अनुसार पिछले 100 वर्षों में वैश्विक मीठे पानी के उपयोग में छह गुना वृद्धि हो गई है। बावजूद इसके अपशिष्ट जल का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बिना ट्रीटमेंट के जलधाराओं में छोड़ दिया जाता है। इस समय मौजूद कन्वेशनल वाटर ट्रीटमेंट प्रक्रिया बेहद खर्चीली है।
इसमें ज्यादा विद्युत खर्च, कीचड़ का निपटान और भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बड़ी समस्या है। ऐसे में सूक्ष्म शैवाल द्वारा मध्यस्थता वाली जैविक अपशिष्ट जल उपचार एक बेहतर विकल्प है। इससे न सिर्फ अपशिष्ट जल 90 प्रतिशत तक साफ होगा बल्कि सूक्ष्म शैवाल बॉयोमास के रूप में उच्च गुणवत्ता वाली खाद भी बेहद उपयोगी साबित होगी। शोध टीम में शामिल विशाल सिंह ने बताया कि सूक्ष्म शैवाल आधारित अपशिष्ट जल उपचार प्रक्रिया को अनुकूलित करने के लिए मशीन लर्निंग टूल्स को सफलतापूर्वक लागू किया गया है।
नदियों, खेतों में छोड़ जा सकता है अपशिष्ट जल
सूक्ष्म शैवाल अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र वर्तमान पारंपरिक अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों को पूरी तरह से बदल सकते हैं। डॉ. विशाल मिश्रा ने बताया कि सूक्ष्म जीव आधारित उपचार संयंत्र से उत्पन्न उपचारित पानी डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा करता है, और इसे आसानी से नदियों में छोड़ा जा सकता है। इसके अलावा, उपचारित पानी का उपयोग सिंचाई और सफाई के उद्देश्य से किया जा सकता है, इस प्रकार उपलब्ध प्राकृतिक मीठे पानी के संसाधनों पर भार कम हो जाता है। इससे पेयजल की किल्लत की समस्या का समाधान कर समाज को फायदा होगा।