कोरोनावायरस की वजह से यहां लौट आए अच्छे दिन, हस्तनिर्मित पिचकारियों का बढ़ चला दौर
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कोरोनावायरस के कारण चाइना निर्मित प्लास्टिक पिचकारियों की आवक कम होने और प्लास्टिक के प्रति जागरूकता से काशी के पीतल पिचकारियों के शिल्पी और ट्रेडर काफी खुश हैं। फिर से पीतल की हाथ से बनी पिचकारियों से बाजार गुलजार हो गए हैं और लोग टिकाऊ होने के साथ ही इसको एक पूंजी के रूप में भी रख रहे हैं।
पीतल होने के कारण ये इसे फिर से ठीक कराया जा सकता है, या फिर बहुत पुराना होने पर भी पीतल के भाव में बिक जाता है। यह मेटल क्राफ्ट जीआई पंजीकृत उत्पाद हैं, जो अभी कुछ शिल्पियों द्वारा बनाया जा रहा है, लेकिन विश्वास है कि अगले साल से यह फिर से अपने नई ऊंचाईयों के साथ आगे बढ़ेगा।
हाथ से बनी पीतल पिचकारियों निर्माता भुलेटन निवासी मनोज सिंह कसेरा ने बताया कि पहले पीतल की पिचकारियों का दौर बहुत रहा और कई सौ कारीगर इस परंपरागत कारोबार में लगे थे, और पूरे देश-विदेश में भारतीय मूल के लोगों के लिए जाता रहा।
जब से चीन ने बनारस की ही नकल कर टंकी वाली प्लास्टिक की पिचकारियों को भी बाजार में उतार दिया था, इस कारण हस्त निर्मित पिचकारियों पर संकट आ गया था, जबकि वह टिकाऊ भी नहीं है, यूज एंड थ्रू वाला होता है। लेकिन हम लोगों ने उत्पादन जारी रखा, और इस वर्ष अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। पदमश्री से सम्मानित जीआई विशेषज्ञ डॉ रजनी कांत बताते है कि पीतल की पिचकारियों का दौर कोरोना के चलते लौट आया।
कसेरा महासभा के सदस्य और राज्य पुरस्कार से सम्मानित शिल्पी अनिल कसेरा का कहना है कि सरकार की बनारस के मेटल के उत्पादों को मुरादाबाद और अलीगढ़ की ही तरह पूरा सहयोग करना चाहिए, क्योंकि बनारस का मेटल उत्पाद देश में बहुत ही पुराना, परंपरागत और जीआई पंजीकृत उत्पाद है। सरकार को बनारस के धातु शिल्पियों आगे बढ़ाने के लिए कॉमन फैसिलिटी केंद्र, रॉ मेटेरियल डिपो की स्थापना के साथ ही, सौर उर्जा सब्सिडी देना चाहिए।