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Gyanvapi Case: मुस्लिमों के ज्ञानवापी प्रवेश पर रोक की मांग पर सुनवाई पूरी, 27 को आ सकता है आदेश

Sat, 15 Oct 2022 06:31 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Sat, 15 Oct 2022 06:31 PM IST
सार

ज्ञानवापी मस्जिद गिराकर हिंदुओं को सौंपने, मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक संबंधी वाद सुनवाई योग्य है या नहीं, इस मुद्दे पर सुनवाई पूरी हो गई है। सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आदेश के लिए 27 अक्तूबर की तिथि तय की है। 

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Gyanvapi Case Hearing on demand for ban on entry of Muslims in Gyanvapi masjid order may come on 27th
मई माह में हुआ था ज्ञानवापी परिसर का सर्वे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ज्ञानवापी मस्जिद गिराकर हिंदुओं को सौंपने, मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक संबंधी वाद सुनवाई योग्य है या नहीं, इस मुद्दे पर सिविल जज सीनियर डिवीजन फास्ट ट्रैक कोर्ट महेंद्र कुमार पांडेय की अदालत में सुनवाई पूरी हो गई। अदालत ने सभी पक्षकारों को 18 अक्तूबर तक लिखित बहस दाखिल करने के लिए कहा। इसके साथ ही आदेश के लिए 27 अक्तूबर की तिथि तय की।

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शनिवार को अदालत में लॉर्ड आदि विश्वेश्वर के नेक्स्ट फ्रेंड किरन सिंह की तरफ से मानबहादुर सिंह, शिवम गौड़ और अनुपम द्विवेदी ने दलीलें पेश की। वरिष्ठ अधिवक्ता मानबहादुर सिंह ने कहा कि वाद सुनवाई योग्य है या नहीं, इस मुद्दे पर अंजुमन इंतजामिया की तरफ से जो भी मुद्दा उठाया गया है वह साक्ष्य व ट्रायल का विषय है।

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हिंदू पक्ष बोला- मस्जिद है या मंदिर ट्रायल से पता चलेगा

कहा कि पिलर और फाउंडेशन मंदिर का है। जब ट्रायल होगा तभी पता चलेगा कि वह मस्जिद है या मंदिर। दीन मोहम्मद के फैसले के जिक्र पर कहा कि कोई हिंदू पक्षकार उस मुकदमे में नहीं था। इसलिए हिंदू पक्ष पर लागू नहीं होता है। यह भी दलील दी कि विशेष धर्म स्थल स्थल विधेयक 1991 इस वाद में प्रभावी नहीं है।

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Gyanvapi Case Hearing on demand for ban on entry of Muslims in Gyanvapi masjid order may come on 27th
वाराणसी कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

स्ट्रक्चर का पता नहीं कि मंदिर है या मस्जिद। जब ट्रायल होगा तभी पता चलेगा कि मस्जिद है या मंदिर जिसके ट्रायल का अधिकार सिविल कोर्ट को है। कहा कि ऐतिहासिक तथ्य है कि औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने और मस्जिद बनवाने का आदेश दिया था। वक्फ एक्ट हिंदू पक्ष पर लागू नहीं होता है, ऐसे में यह वाद सुनवाई योग्य है और अंजुमन की तरफ से पोषणीयता के बिंदु पर दिया गया आवेदन खारिज होने योग्य है।

साथ ही राइट टू प्रॉपर्टी के तहत देवता को अपनी प्रॉपर्टी पाने का मौलिक अधिकार है। ऐसे में नाबालिग होने के कारण वाद मित्र के जरिये यह वाद दाखिल किया गया है। भगवान की प्रॉपर्टी है तब माइनर मानते हुए वाद मित्र के जरिये क्लेम किया जा सकता है। स्वीकृति से मालिकाना हक नहीं हासिल होता है। यह बताना पड़ेगा कि संपत्ति कहां से और कैसे मिली। अदालत में वाद के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट की 6 रूलिंग और संविधान का हवाला भी दिया गया। 

मुस्लिम पक्ष ने उठाए सवाल

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मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता रईस अहमद और एखलाक अहमद - फोटो : अमर उजाला

वहीं मुस्लिम पक्ष यानि अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी की तरफ से अधिवक्ता मुमताज अहमद, तौहीद खान, रईस अहमद, मिराजुद्दीन खान और एखलाक खान ने कोर्ट में प्रतिउत्तर में सवाल उठाए। कहा कि जब देवता की तरफ से मुकदमा किया गया तब वादी पक्ष की तरफ से पक्षकार 4 और 5 विकास शाह और विद्याचन्द्र कैसे वाद दाखिल कर सकते हैं। कहा कि वादी पक्ष आराजी संख्या 9130 के एक बीघा, 9 विस्वा 6 धूर के खसरा को गलत बता रहा है। तब यह वाद कैसे विश्वसनीय माना जाए।
पढ़ें: ज्ञानवापी में मिले 'शिवलिंग' की कार्बन डेटिंग नहीं होगी, पढ़िए कोर्ट ने आदेश में क्या कहा

कहानी से कोर्ट नहीं चलती

एक तरफ कहा जा रहा है कि वाद देवता की तरफ से दाखिल है वहीं दूसरी तरफ पब्लिक से जुड़े लोग भी इस वाद में शामिल हैं। यह वाद किस बात पर आधारित है इसका कोई पेपर दाखिल नहीं किया गया है और कोई सबूत नहीं है। कहानी से कोर्ट नहीं चलती। कहानी और इतिहास में फर्क है। जो इतिहास है वही लिखा जाएगा साथ ही कानूनी नजीरें दाखिल कर कहा गया कि वाद सुनवाई योग्य नहीं है और इसे खारिज कर दिया जाए। 

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