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गंगा निर्मलीकरण पर करोड़ों रुपये हुए खर्च, फिर भी दूषित गंगा जल में ही डुबकी लगाएंगे श्रद्धालु

Wed, 20 Dec 2017 03:15 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी Updated Wed, 20 Dec 2017 03:15 PM IST
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Ganga water polluted after spending crores rupees
गंगा में फैली गंदगी - फोटो : अमर उजाला
तीर्थनगरी काशी में गंगा निर्मलीकरण की योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पा रही हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी न तो घरेलू और औद्योगिक अवजल के शोधन की व्यवस्था की जा सकी और न नालों को गंगा में बहने से रोका जा सका।
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माघ मेला और मौनी अमावस्या पर दूषित गंगा जल में ही देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालु डुबकी लगाएंगे। नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा (एनएमसीजी) की ओर से गंगा में एक बूंद भी सीवर का गंदा पानी न जाने देने की हिदायतें बेअसर रह गईं।
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सामने घाट से सराय मोहाना के बीच सौ से अधिक छोटे-बड़े नाले जस के तस बह रहे हैं। 10 से अधिक घाटों को धोबी घाट के रूप में तब्दील कर दिया गया है। दूसरी ओर हर दिन नया स्लोगन सामने जरूर आ रहा है। गंगा में गिरने वाले 23 बड़े नालों को बंद करने के निर्देश सिर्फ कागज पर हैं।
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दशाश्वमेध घाट पर जहां विश्व भर के पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की भीड़ लगती है, उससे लगे राजेंद्र प्रसाद घाट पर के सीवेज पंपिंग स्टेशन से हजारों लीटर अवजल बहाया जा रहा है।

इससे दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर सीवर का पानी ठहर गया है। शीतला घाट पर भी यही स्थिति है। इसी वजह से मीरघाट, मानमंदिर घाट पर भी गंगा जल स्नान के योग्य नहीं रह गया है। 

गंगा की धारा में प्रवाह नाम मात्र 

Ganga water polluted after spending crores rupees
गंगा में बदता नाला - फोटो : अमर उजाला
मणिकर्णिका घाट पर जहां शवों को स्नान कराकर मोक्ष की धारणा से अंतिम संस्कार होता है, वहां भी नाला बह रहा है। असि नदी के जरिए शहर के दक्षिणी हिस्से का अवजल भी दिन रात सीधे गंगा में बहाया जा रहा है।

वर्तमान में शहर के औद्योगिक और घरेलू नालों से 450 एमएलडी अवजल का डिस्चार्ज गंगा में किया जा रहा है। घाटों की सीढ़ियों पर प्लास्टिक के कचरे और किनारों पर फूलमाला बहाने पर भी रोक नहीं लगाई जा सकी है।

साबुन लगाने और खुलेआम घाटों पर अस्पतालों और होटलों के कपड़ों की धुलाई कराई जा रही है। राजा घाट, लाली घाट, मीर घाट, त्रिलोचन घाट, गाय घाट, गोला घाट और राजघाट पर धोबियों के पाट संचालित हो रहे हैं। भैंसों के झुंड भी गंगा में ही लोट रहे हैं।

नदी वैज्ञानिक यूके चौधरी का कहना है कि पश्चिमी नहरों के जरिए सर्वाधिक गंगा जल का दोहन दिल्ली के लिए हो रहा है। इससे काशी में गंगा की धारा में प्रवाह नाम मात्र का रह गया है। गंगा में पर्याप्त जल छोड़े बगैर समस्या का समाधान नहीं होगा।

पर्यावरणविद प्रो. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि लगातार बढ़ रहे प्रदूषण से गंगा में पानी की मात्रा लगातार कम हो रही है। अभी तक जिनती योजनाएं बनी हैं, वह सिर्फ प्रदूषण नियंत्रण को लेकर बनाई गई हैं। जबकि प्रवाह बढ़ाने पर सरकार का ध्यान नहीं है। 
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