Chaitra navratri 2023: चैत्र नवरात्रि का पहला दिन, नाव पर सवार होकर आईं मां, जानिए- कलश स्थापना का मुहूर्त
काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि माता का आगमन और प्रस्थान सुखदायक है। नवरात्र में सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि, रवि योग और गुरु पुष्य योग का महा संयोग निर्मित हो रहा है। श्रद्धालुओं को इस बार पूरे नौ दिन माता की आराधना के लिए मिल रहे हैं।
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शक्ति की अधिष्ठात्री मां दुर्गा का आगमन बुधवार को नाव पर होगा। नाव पर सवार होकर ही मां दुर्गा कलश में विराजेंगी, फिर 30 मार्च को महानवमी पर हाथी पर सवार होकर प्रस्थान करेंगीं। महाअष्टमी व्रत का पारण 30 मार्च और नौ दिनों का व्रत रखने वाले 31 मार्च को पारण करेंगे।
काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि माता का आगमन और प्रस्थान सुखदायक है। नवरात्र में सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि, रवि योग और गुरु पुष्य योग का महा संयोग निर्मित हो रहा है। श्रद्धालुओं को इस बार पूरे नौ दिन माता की आराधना के लिए मिल रहे हैं। सप्तमीयुक्त अष्टमी में श्रद्धालु महानिशा की पूजा करेंगे। निशिथ व्यापिनी अष्टमी योग 28 मार्च को बन रहा है, जो महानिशा पूजन के लिए सर्वोत्तम है। महाष्टमी व्रत 29 मार्च को और महानवमी 30 मार्च को होगी।
कलश स्थापना का मुहूर्त व पूजन
ज्योतिषाचार्य विमल जैन के मुताबिक, नवरात्र में तीन सिद्धियोग व कई महायोग बन रहे हैं। कलश स्थापना का मुहूर्त बुधवार की सुबह 10:03 मिनट तक है। कलश लोहे या स्टील का नहीं होना चाहिए। काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के सदस्य पं. दीपक मालवीय के अनुसार, कलश स्थापना के लिए पवित्र मिट्टी से वेदी का निर्माण करें। इसमें जौ और गेहूं बोएं। यथाशक्ति मिट्टी, तांबे या सोने का कलश स्थापित करें। खुद या फिर ब्राह्मणों की मदद से गणेशाम्बिका, वरुण, षोडशमातृका, सप्त घृत मातृका, नवग्रह आदि देवों का पूजन और पुण्याहवाचन कराएं।इसके बाद उसका षोडशोपचार पूजन करें। श्रीदुर्गासप्तशती का संपुट या साधारण पाठ भी कराया जा सकता है। पाठ की पूर्णाहुति के दिन दशांश हवन व दशांश पाठ करना चाहिए।
कन्या पूजन
कुमारी कन्याओं का पूजन नवरात्र व्रत का अनिवार्य हिस्सा है। कुमारिकाएं जगतजननी जगदंबा का प्रत्यक्ष विग्रह हैं। सामर्थ्य हो तो नौ दिन तक अन्यथा सात, पांच, तीन या एक कन्या को देवी मानकर पूजा करनी चाहिए, फिर उन्हें भोजन कराना चाहिए।
नवदुर्गा को करें अर्पित
प्रतिपदा- उड़द, हल्दी, माला-फूल
द्वितीया-तिल, शक्कर, चूड़ी, गुलाल शहद
तृतीया-लाल वस्त्र, शहद, खीर, काजल
चतुर्थ- दही, फल, सिंदूर, मसूर
पंचमी-दूध, मेवा, कमलपुष्प, बिंदी
षष्ठी-चुनरी, पताका, दूर्वा
सप्तमी-बताशा, इत्र, फल-पुष्प
अष्टमी-पूड़ी, पीली मिठाई, कमलगट्टा, चंदन, वस्त्र
नवमी-खीर, सुहाग सामग्री, साबुदाना, अक्षत फल, बताशा
दुर्गासप्तशती के पाठ से मिलता है फल
दुर्गासप्तशती के एक पाठ से फलसिद्धि, तीन से उपद्रव शांति, पांच से सर्वशांति, सात से भय मुक्ति, नौ से यज्ञ के समान फल, 11 पाठ से राज्य की प्राप्ति, बारह पाठ से कार्यसिद्धि, चौदह पाठ से वशीकरण, पंद्रह पाठ से सुख-संपत्ति, सोलह पाठ से धन व पुत्र की प्राप्ति, सत्रह पाठ से राजभय व शत्रु रोग से मुक्ति, 20 पाठ से ग्रहदोष शांति और पच्चीस पाठ से बंधन मुक्ति।