खेती-किसानी: गेहूं की बोआई में देरी से रोज घटती है 50 किलो तक पैदावार, किसानों को दिए गए टिप्स; आप भी जानें
गेहूं की बोआई को लेकर वैज्ञानिकों ने शोध किए हैं। पाया गया कि अगर खेती करते समय का ध्यान नहीं रख गया तो इससे पैदावार पर असर पड़ता है। माैसम के हिसाब से खेती करनी चाहिए।
विस्तार
किसान अगर गेहूं की बोआई देरी से करते हैं तो नुकसान होगा। अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (इरी) के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) ने धान-गेहूं की बोआई के बीच के प्रबंधन का खाका तैयार किया है। वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि एक से 20 नवंबर के बाद गेहूं की बोआई करते हैं तो इसके पैदावार में प्रतिदिन प्रति हेक्टेयर 40 से 50 किलो घटेंगे। गर्मी से दाने सिकुड़ जाते हैं। लिहाजा, धान की कटाई समय पर करें और खेत तुरंत तैयार कर बोआई करें।
आइसार्क के निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह ने बताया कि गेहूं की बोआई में एक-एक देर होने से उतना ही उत्पादन घटता जाता है। गेहूं बोने का सबसे अच्छा समय एक से 20 नवंबर तक है। इस अवधि में सर्दी का पूरा फायदा मिलता है, जिससे अधिक फुटाव और दाने भी बेहतर विकसित होते हैं। अध्ययन में पाया गया कि समय पर बोआई से किसानों को अतिरिक्त लागत नहीं लगानी पड़ती है। इसके बिना 69 फीसदी तक ज्यादा पैदावार कर सकते हैं।
धान की सीधी बोआई से 10 दिन पहले कटाई : इरी के आइसार्क ने धान की सीधी बोआई (डीएसआर) पर की पद्धति तैयार किया है। डॉ. शुधांशु सिंह ने बताया कि विश्व बैंक के सहयोग से यूपीएग्रीज परियोजना के तहत डीएसआर से धान की बोआई करते हैं तो इसकी कटाई 7–10 दिन पहले हो जाती है।
साथ ही पानी, मजदूरी और डीजल की भी बचत होती है। मशीन से कटाई और अवशेष प्रबंधन जल्दी हो जाते हैं। जीरो टिलेज गेहूं की पद्धति को अपनाने से खेत को जोतने की जरुरत नहीं होती है, जिससे समय पर बोआई हो जाती है। इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है।
लंबी अवधि का धान देर का कारण : गेहूं की बोआई में ज्यादातर देरी लंबी अवधि की धान की फसल है। डॉ. शुधांशु सिंह ने बताया कि पूर्वांचल समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश में गेहूं की 60 फीसदी बोआई देरी से होती है। ज्यादा किसान खरीफ मौसम में लंबी अवधि की धान की किस्में लगाते हैं और उन्हें रोपाई कर उगाते हैं। इस पद्धति से खेत तैयार होने में समय लगता है। ऐसे में कटाई व मड़ाई में देरी होती है।