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बीमारी: गंदा पानी पीने से 5 साल के बच्चों की आंतों में सूजन, सिकुड़ने का खतरा भी; हर हफ्ते आ रहे 10 बच्चे

Fri, 23 Jan 2026 10:26 AM IST
अमन विश्वकर्मा रबीश श्रीवास्तव, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
रबीश श्रीवास्तव, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 23 Jan 2026 10:26 AM IST
सार

Varanasi News: गंदा पानी पीने से बच्चाें में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। स्वास्थ्य की जांच में सामने आए चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। चिकित्सकों ने बताया कि इस बीमारी से बचने के लिए सावधानी बरतने की जरूरत है।

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Drinking contaminated water increases risk of inflammation and constriction in intestines of children
गंदा पानी पीने से पूर्वांचल में 5 साल के बच्चों की आंत में सूजन हो रही है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गंदा पानी पीने से पूर्वांचल में 5 साल के बच्चों की आंत में सूजन हो रही है। बीएचयू अस्पताल के बाल रोग विभाग की ओपीडी में वाराणसी, गाजीपुर, जौनपुर, सोनभद्र, मिर्जापुर आदि जिलों से हर सप्ताह ऐसे लगभग 10 बच्चे आते हैं। अभिभावक बच्चों की उम्र के अनुसार वजन न बढ़ने और शारीरिक विकास धीमा होने की समस्या लेकर आते हैं।

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परिवार के सदस्यों से पूछताछ और चिकित्सकीय जांच में पता चला है कि इस समस्या की बड़ी वजह पानी में बैक्टीरियल टॉक्सिन का अधिक होना है। डॉक्टरों के अनुसार जब बच्चों के स्टूल यानी मल की जांच कराई जाती है, तो ऐसे बच्चों में एमपीओ (मायलोपेरोक्साइड) लेवल सामान्य से 5 से 10 गुना अधिक पाया गया। 
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समय पर अस्पताल में इलाज न कराया जाए तो आगे चलकर आंतों के सिकुड़ने का खतरा भी रहता है। बीएचयू में बच्चों की जांच और इलाज के साथ ही उनके अभिभावकों को इस समस्या के कारण और बचाव के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

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शुद्ध पानी की अहमियत
बच्चे हो या बड़े, शुद्ध पानी मिलना सभी के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। पांच साल तक के बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सबसे अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। बीएचयू अस्पताल के बाल रोग विभाग की ओपीडी में हर सप्ताह आने वाले बच्चों के साथ ही हाल में भर्ती 101 बच्चों पर एक अध्ययन किया गया, जिसमें पहले से कुपोषित, अतिकुपोषित और स्वस्थ बच्चों की जांच की गई। सभी बच्चों की उम्र पांच साल और उससे कम थी। 

अध्ययन के परिणाम में पता चला कि सभी श्रेणियों के बच्चों के आंतों में सूजन के साथ ही एमपीओ लेवल मानक से अधिक था। बाल रोग विभाग के प्रो. सुनील राव के अनुसार बच्चों के स्टूल की जांच में यह स्थिति सामने आई। अभिभावकों से बातचीत और प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर इसकी मुख्य वजह दूषित पानी पीना पाया गया।

जांच में सामने आए चौंकाने वाले परिणाम

  • 61 बच्चे (अति कुपोषित श्रेणी) – एमपीओ लेवल 20,000 नैनोग्राम/ग्राम
  • 25 बच्चे (कुपोषित श्रेणी) n एमपीओ लेवल 9,500 नैनोग्राम/ग्राम
  • 15 बच्चे (स्वस्थ) – एमपीओ लेवल 8,250 नैनोग्राम/ग्राम
  • (बाल रोग विशेषज्ञ प्रो. सुनील कुमार राव के अनुसार जिन बच्चों के आंतों में सूजन नहीं है, उनमें एमपीओ लेवल 2,000 नैनोग्राम/ग्राम से कम होना चाहिए।)

सावधानी बरतने की जरूरत

  • पानी को गुनगुना करके बच्चों को दिया जाए।
  • बच्चे मिट्टी में खेलकर घर आएं तो अच्छे तरीके से हाथ धोएं।
  • जिस जगह पानी पी रहे हैं या रखा जा रहा है, वहां स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाए।

एमपीओ एक तरह का एंजाइम, इसका असर आंतों पर ही पड़ता है
एमपीओ यानी मायलो पैरोक्सीडेज एक एंजाइम होता है। यह एंजाइम बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक पदार्थों के कारण होने वाले संक्रमण से लड़ने में शरीर की रक्त कोशिकाओं की मदद कर प्रतिरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर किसी के आंतों में सूजन या कोई संक्रमण है तो संबंधित मरीज के स्टूल यानी मल में इसकी मात्रा औसत से अधिक होती है। इसका असर सीधे तौर पर आंतों पर पड़ता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता कम इसलिए चपेट में आ रहे बच्चे
बड़ों की तुलना में तक पांच साल तक के बच्चों पर इसका अधिक प्रभाव देखने को मिल रहा है। ऐसा इसलिए बच्चों के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। ओपीडी में भी आंतों में सूजन वाले बच्चे अधिक आ रहे हैं। बड़ों में भी इस तरह की समस्या हो सकती है, इस पर भी अध्ययन करने की जरूरत है।

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