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गंगा जमुनी तहजीब की अद्भुत मिसाल चुनार दरगाह शरीफ, हर वर्ष चैत माह में लगता है मेला

Fri, 07 Apr 2017 01:32 AM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,मिर्जापुर
ब्यूरो,अमर उजाला,मिर्जापुर Updated Fri, 07 Apr 2017 01:32 AM IST
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chunar dargah sharif is uniqe symbol of hindu musli culture
चैती मेला में हर वर्ग के लोगों ने मजार पर टेका माथा - फोटो : self
चुनार के गंगा तट पर बना सैकड़ों साल पुराना पत्थर कारीगरी का बेहतरीन नमूना संत कासिम सुलेमानी की दरगाह गंगा जमुनी तहजीब की अद्भुत मिसाल है। 400 साल से अधिक समय से संत कासिम सुलेमानी की दरगाह पर हर साल की भांति इस वर्ष भी चैत माह में चैती मेला लगा। जिसमें गुरुवार को बाबा के भक्तों की भारी भीड़ चुनार दरगाह शरीफ पहुंची।
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बाबा के मजार पर सजदा कर अपनी मन्न्ते मांगी कई भक्तों/जायरीनों  ने अपनी मुराद पूरी होने पर बाबा के मजार पर चादरपोशी कर फातिहा पढ़ा और प्रसाद बांटा।  दरगाह पर पूरी रात चलने वाले इस मेले में देश के कोने कोने से हर धर्म  के लोग यहां आते है और बाबा के दरबार में अपनी अर्जी लगाते है।
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यह मेला होली के तत्काल बाद लगातार पांच गुरूवार को लगता है।  दरगाह के  खलीफा सज्जादानशींन हाजी सैयद उतार्उरहमान दीवाना ने बताया कि संत कासिम  सुलेमानी पेशावर के रहने वाले थे।
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कहा जाता है कि मानवता की पूजारी संत  कासिम सुलेमानी के पास बादशाह जहांगीर ने जंजीर और शमशीर भेजी और फरमान  भेजा की बादशाह का हुक्म मानो या जंग करो या फिर मेरी कैद में चले जाओ। संत ने लड़ाई झगड़ा से अच्छा समझा कि शांति से कैद में रहा जाए।

जिस पर  उन्होंने जंग से इंकार कर कैद स्वीकार कर लिया। जिस पर बादशाह के हुक्म से 1015 हिजरी को चुनार दुर्ग में संत कासिम सुलेमानी को कैद कर दिया गया और  उन पर कड़ी निगहबानी की जाने लगी।

कुछ दिन बाद बादशाह को सूचना मिली की संत  कासिम सुलेमानी कभी कारागार तो कभी बाहर नजर आते है। यहां वहां घूमते है,  पहाड़ों की सैर करते है। नमाज के वक्त उनकी जंजीर खुल जाती है।

जिसे सुन कर  बादशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने संत से माफी मांगते हुए उनको  रिहा कर दिया और उनको दुर्ग के समीप जमीन भेंट स्वरूप दिया। जिस पर संत  कासिम के मौत के बाद उनके परिजनों ने एक भव्य दरगाह का निर्माण कराया। 

यहां का शांत वातावरण है आकर्षण केंद्र

chunar dargah sharif is uniqe symbol of hindu musli culture
कासिम सुलेमानी की दरगाह - फोटो : chunar.net
खलीफा साहब ने बताया कि अंग्रेजी हुकुमत के दौरान यहां वाइसराय लार्ड कर्जन  भी बाबा के दरबार में आ चुका है। इसके अलावा भी कई नामी गिरामी लोग आए दिन  इस दरगाह में अपनी मुराद ले कर पहुंचते रहते है। यहां का शांत वातावरण व  हरियाली बरबस यहां आने वाले को अपनी ओर आकर्षित करता है। मेले के दौरान  यहां पर हर प्रकार की दुकानें लग जाती है। जहां से लोग अपनी जरूरत का सामान  खरीदते है। मेले में स्थानीय स्तर पर बनने वाले बिस्कुट, बेल, बेनचूर को  खरीद कर लोग घर ले जाते है। 
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