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Chandrashekhar Azad Jayanti: एक चुटकी राख के लिए मची थी भगदड़, आजाद की ये फोटो हासिल नहीं कर पाए थे अंग्रेज

Thu, 23 Jul 2020 11:47 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Thu, 23 Jul 2020 11:47 AM IST
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Chandra Shekhar Azad Jayanti 2020: Stampede For A Pinch Of Bone Ashes British Did Not Get Chandrasekhar Azad's Teenage Photos
चंद्रशेखर आजाद की किशोरावस्था की फोटो। - फोटो : अमर उजाला।

प्रयागराज में वीरगति के बाद महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की अस्थियां काशी लाई गई थीं। 1974 में कांग्रेस के टिकट से सहारनपुर से एमएलए चुने जाने के बाद सरदार भगत सिंह के छोटे भाई सरदार कुलतार सिंह 1976 में काशी आए। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी पंडित शिव विनायक मिश्रा के घर से आजाद का अस्थि कलश ले जाकर लखनऊ स्थित संग्रहालय में रखवाया। 

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23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आजाद संस्कृत की पढ़ाई के लिए 12 वर्ष की उम्र में काशी आ गए थे। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने का संकल्प लिया और काशी में ही क्रांति की राह चुनी। खोजवा बाजार नवाबगंज निवासी स्वतंत्रता सेनानी पं. शिव विनायक मिश्र काशी में उनके अभिभावक थे।
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पं. शिव विनायक उन्नाव के रहने वाले थे और रिश्ते में आजाद के फूफा थे। वह बनारस की नगर कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी और बड़े कांग्रेस नेताओं में से एक थे। आजाद पर शोध कर रहे बनारस बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री अधिवक्ता नित्यानंद राय ने बताया कि आजाद की किशोरावस्था की एक तस्वीर हासिल करने के लिए अंग्रेजों ने कई बार पं. शिव विनायक के घर पर छापा मारा था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिलती थी। वह तस्वीर आज भी सुरक्षित है।

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एक चुटकी राख के लिए मच गई थी भगदड़
आजाद के अंतिम संस्कार में क्रांतिकारी शचिंद्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल भी आई थीं। उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि जब खुदीराम बोस को फांसी पर लटकाया गया था तो बंगाल की माताएं उनकी राख लेकर गई थीं और अपने बच्चों को ताबीज बनाकर दिया था, ताकि वह भी क्रांतिकारी बनें। यह सुन कर भीड़ टूट पड़ी थी और एक चुटकी राख के लिए भगदड़ मच गई थी। 

काशी लाया जाए अस्थि कलश
आजाद इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। इलाहाबाद में रसूलाबाद घाट पर आजाद का अंतिम संस्कार किया गया था, जहां कमला नेहरू भी आईं थीं। उन्होंने पं. शिव विनायक को भी बुलाया गया था। अंत्येष्टि के बाद अस्थियां लेकर वह बनारस लौट आए थे।

पं. शिव विनायक के पुत्रों श्याम सुंदर मिश्र, राजीव लोचन मिश्र और फूलचंद्र मिश्रा से 10 जुलाई 1976 को अस्थि कलश लेकर लखनऊ संग्रहालय में रखवाया गया था। नित्यानंद राय ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि आजाद की कर्मभूमि काशी थी, इसलिए उनका अस्थि कलश भी यहीं स्थापित किया जाए। 

क्रांति की राह चुनने के बाद भी रहते थे फूफा के संपर्क में
आजाद के फुफेरे भाई स्व. राजीव लोचन मिश्र के पुत्र डॉ. कृष्ण मोहन मिश्र के अनुसार, लखनऊ के म्यूजियम में आजाद का अस्थि कलश और उनका हस्तलिखित पत्र रखा गया है। उन्होंने बताया कि देश की आजादी के लिए जब आजाद ने क्रांति की राह चुनी तो उनका कोई निश्चित ठिकाना नहीं रहता था, लेकिन वह अपने फूफा पं. शिव विनायक के संपर्क में रहते थे।

अंग्रेज अफसर को उपहार में दी थी आजाद की पिस्तौल
ब्रिटिश हुकूमत ने अंग्रेज अफसर जॉन नॉट बावर को आजाद की पिस्तौल उपहार के तौर पर दी था। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि ब्रिटिश हुकूमत के लिए बहुत बड़ी सफलता थी। वर्ष 1972 में तत्कालीन केंद्र और प्रदेश सरकार के प्रयास से पिस्तौल वापस मंगवाई गई। पिस्तौल भारत आने के छह महीने बाद ही बावर की मौत हो गई थी।

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