पुरातत्वविदों की खुदाई जारी, बभनियाव में गुप्तकालीन संस्कृति के पुरावशेषों के बाद मिला शिवलिंग
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वाराणसी के बभनियाव गांव में गुप्तकालीन संस्कृति के पुरावशेषों के मिलने के बाद अब बीएचयू पुरातत्वविदों की टीम ने ईंट की दीवार के विस्तार को जानने के लिए जब उत्खनन कार्य शनिवार को आगे बढ़ाया तो करीब आधा फुट तक खुदाई के बाद शिवलिंग दिखा। पुरातत्वविदों की टीम ने भी पुष्ट किया है कि शनिवार को मिली प्रस्तर आकृति शिवलिंग ही है।
दरअसल, राजातालाब के पास बीएचयू प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष प्रो. ओएन सिंह के निर्देशन में खुदाई जारी है। प्रो. सिंह के मुताबिक पहले हुए सर्वेक्षण में यहां ताम्रपाषाणीन कालीन संस्कृति से जुड़ी जानकारियां भी मिली हैं। जो 3000 से 3500 साल पहले की हैं।
खुदाई में मिला शिवलिंग।
वहीं शुक्रवार को मिली दीवार के आसपास शनिवार को खुदाई कराई गई तो पता चला कि वह और नीचे तक है। अब तक छह फीट तक दीवार मिल चुकी है। प्रो. अशोक के मुताबिक अभी और नीचे खुदाई कराई जाएगी। माना जा रहा है कि यह दीवार और लंबी हो सकती है।
इसके अलावा दीवार के पास ही एक पत्थर की आकृति भी मिली है। यह आकृति क्या है, इसकी जांच के बाद भी कुछ कहना ठीक होगा। खुदाई में हर एक दिन नई-नई जानकारियां और अहम पुरावशेष मिल रहे हैं। इसकी जानकारी होने के बाद यहां आसपास के महाबन, औढ़े आदि गावों के साथ ही शहरी क्षेत्र से भी कुछ लोग भी पहुंचने लगे हैं।
अब तक ये मिले सामान-
गुप्तकालीन भट्ठी
लौह सामग्रियां
देवी-देवताओं की मूर्तियां
मंदिर के संकेत
शिवलिंग
पत्थर के टुकड़े
दीवार
ग्राम तीनकेणवा में टीले के भी प्राचीनतम होने का अनुमान है। एक दशक पहले यहां पुरातात्विक अवशेष मिले थे। तत्कालीन जिलाधिकारी से जांच की मांग की गई थी। -नीरज पांडेय पूर्व ग्राम प्रधान ढढोरपुर
महावन गोपाल सिंह ने बताया कि गांव में भी प्राचीन मूर्तियां और पुरावशेष मिलते रहे हैं। बभनियाव के बाद गांव के हजारों वर्ष पुराने होने की बात सच लगने लगी। महावन में भी खुदाई कराकर इसका पता लगाना चाहिए। कमलापति दुबे पनियरा ने बताया कि क्षेत्र के तमाम गांव प्राचीन धरोहर तथा आदिकालीन सभ्यता से जुड़े हुए हैं। गांव में मिल रहे अवशेष काशी की नई कहानी लिखेंगे।
पनियारा में भी टीले पर अक्सर प्राचीन अवशेष मिलते रहे हैं। पूर्व शोध छात्र डॉ. अवधेश सिंह कहा कहना है कि मरूई गांव के में पुरातात्विक तरीके से खुदाई और अध्ययन किया जाए तो प्राप्त सामग्री के आधार पर मौर्य काल के पीछे तक की ऐतिहासिकता साबित हो सकती है।