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राष्ट्रप्रेम के तीर्थ पर बदहाली की मार
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sat, 22 Oct 2016 02:01 AM IST
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नशेड़ियों का अड्डा बन गया भारत माता मंदिर परिसर
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काशी में धरोहरें उपेक्षित हैं। न तो उनका संरक्षण हो रहा है न रखरखाव। कभी दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा भारत माता मंदिर परिसर इसकी बनागी है। हालत यह है कि जहां दो सौ से अधिक विदेशी पर्यटकों के कैमरे रोजाना क्लिक करते हैं, वहां बदइंतजामी और मनमानी मुंह चिढ़ा रही है। शाम होते ही नशेड़ियों का जमावड़ा शुरू हो जाता है। कहीं जाम टकराने लगते हैं तो कहीं दगती है चिलम।
स्मार्ट सिटी में शुमार बनारस मंदिरों का शहर है। यहां मंदिरों के साथ मस्जिदों में अजान, गुरुद्वारों में सबद और गिरजाघरों में प्रार्थनाओं की गूंज हर धर्म-संस्कृति के लोगों के दिलों को जोड़ती है लेकिन इन पूजा स्थलों से अलग एक अनूठे तीर्थ की ओर कम लोगों की नजर जाती है। यह राष्ट्रप्रेम की भावना को पैदा करने वाला तीर्थ है भारत माता मंदिर। तमाम विकास की योजनाओं, धरोहरों के संरक्षण की कवायदों के बीच यह मंदिर इन दिनों बदहाल पड़ा है। इसके संरक्षण और देखरेख की चिंता न कभी प्रशासन ने की न सरकार ने। 1924 में मकराना के संगमरमर को काट कर 10 लाख रुपये की लागत से बने इस तीर्थ का उद्घाटन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था। तब बापू ने इस तीर्थ के बारे में जो कहा था, अब वहां ठीक उसके उलट हो रहा है।
काशी में बाबा विश्वनाथ, संकट मोचन और सारनाथ की तरह पर्यटन का अहम केंद्र बन चुके भारत माता मंदिर परिसर में शाम होते ही कहीं अफीमची जम जाते हैं तो कहीं शराबी। हालांकि इस परिसर की देखरेख के लिए मंदिर प्रबंधन ने चार युवकों की तैनाती की है लेकिन खुले परिसर में ऐसे आराजक तत्वों पर उनका बस नहीं चलता। इसी परिसर में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ का ललित कला विभाग होने की वजह से वहां सैकड़ों छात्र-छात्राओं, कलाविदों को भी इस माहौल से दो-चार होना पड़ रहा है लेकिन उनकी इस पीड़ा कोई सुनता ही नहीं।
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स्मार्ट सिटी में शुमार बनारस मंदिरों का शहर है। यहां मंदिरों के साथ मस्जिदों में अजान, गुरुद्वारों में सबद और गिरजाघरों में प्रार्थनाओं की गूंज हर धर्म-संस्कृति के लोगों के दिलों को जोड़ती है लेकिन इन पूजा स्थलों से अलग एक अनूठे तीर्थ की ओर कम लोगों की नजर जाती है। यह राष्ट्रप्रेम की भावना को पैदा करने वाला तीर्थ है भारत माता मंदिर। तमाम विकास की योजनाओं, धरोहरों के संरक्षण की कवायदों के बीच यह मंदिर इन दिनों बदहाल पड़ा है। इसके संरक्षण और देखरेख की चिंता न कभी प्रशासन ने की न सरकार ने। 1924 में मकराना के संगमरमर को काट कर 10 लाख रुपये की लागत से बने इस तीर्थ का उद्घाटन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किया था। तब बापू ने इस तीर्थ के बारे में जो कहा था, अब वहां ठीक उसके उलट हो रहा है।
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काशी में बाबा विश्वनाथ, संकट मोचन और सारनाथ की तरह पर्यटन का अहम केंद्र बन चुके भारत माता मंदिर परिसर में शाम होते ही कहीं अफीमची जम जाते हैं तो कहीं शराबी। हालांकि इस परिसर की देखरेख के लिए मंदिर प्रबंधन ने चार युवकों की तैनाती की है लेकिन खुले परिसर में ऐसे आराजक तत्वों पर उनका बस नहीं चलता। इसी परिसर में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ का ललित कला विभाग होने की वजह से वहां सैकड़ों छात्र-छात्राओं, कलाविदों को भी इस माहौल से दो-चार होना पड़ रहा है लेकिन उनकी इस पीड़ा कोई सुनता ही नहीं।
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