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बेनूर जिंदगियों में भरेंगे फूलों के रंग
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी
Updated Thu, 01 Jan 2015 02:52 AM IST
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श्रद्धालु काशी के मंदिरों में रोजाना कई टन फूल-मालाएं चढ़ाते हैं। अगले दिन भगवान पर चढ़े फूल-मालाओं को या तो कचरे में फेंक दिया जाता है या फिर गंगा और वरुणा में बहा दिया जाता है लेकिन अब भगवान को अर्पित पुष्पों की बेकदरी नहीं होगी। इन फूलों के रंग से काशी में होली खेली जाएगी।
उनकी खुशबू से मंदिर गमकेंगे। इतना ही नहीं, मंदिरों के निर्माल्य (माला-फूल) के प्रबंधन से होने वाली आय से समाज में हाशिए पर जीने वालों की जिंदगी भी संवारी जाएगी। राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत मंदिरों के निर्माल्य से अगरबत्ती और रंग बनाया जाएगा जबकि अन्य पूजन सामग्री के अवशेष से ऐसी वस्तुएं बनेंगी, जिनका सड़क निर्माण में इस्तेमाल होगा।
जिला नगरीय विकास अभिकरण (डूडा) ने इसका प्रस्ताव शासन को भेजा है।
काशी विश्वनाथ, गौरी केदारेश्वर, त्रिदेव मंदिर, चिंतामणि गणेश मंदिर, खांटू श्याम मंदिर और मौनी बाबा आश्रम से रोजाना साढ़े चार टन फूल-मालाएं निकलती हैं। इस निर्माल्य को एकत्रित करके भागीरथी सेवार्चन समिति जैविक खाद बनाती है। काशी में लगभग 1700 मंदिर हैं।
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मोटे अनुमान के मुताबिक इन मंदिरों में रोजाना 65 से 70 टन फूल-मालाएं भक्त अर्पित करते हैं जबकि पर्व त्योहार पर मंदिरों के शृंगार और उत्सव स्थल की सजावट में 125 से 150 टन फूल का इस्तेमाल होता है। अगले दिन ज्यादातर फूल-मालाओं को यूं ही फेंक दिया जाता है। डूडा ने मंदिरों से निकलने वाले निर्माल्य से लोगों की आजीविका तलाशने का उपक्रम शुरू किया है।
डूडा के परियोजना निदेशक कंचन सिंह परिहार ने बताया कि दिल्ली की संस्था सोसाइटी फार चाइल्ड डेवलपमेंट की मदद से फूलों के रंग और खुशबू के सत्व निकाले जाएंगे और उनसे बचने वाले अन्य सामग्री का इस्तेमाल करके अगरबत्तियां बनाई जाएंगी। संस्था इस काम से होने वाली आय से 500 निशक्त बच्चों के अलावा सेक्स वर्करों का पुनर्वास करेगी।
इसके अलावा मंदिरों के पूजन सामग्री, प्लास्टिक, पत्तियों और फलों को इस तरह बदला जाएगा कि उनका इस्तेमाल सड़क निर्माण और दूसरे कामों में हो सके। लखनऊ की संस्था युग एसोसिएट्स इस मामले में तकनीकी सहायता मुहैया कराएगी। इससे कचरा बीनने वालों और स्लम में रहने वालों को रोजगार मुहैया कराया जाएगा। योजना मंजूरी के लिए शासन को भेज दी गई है। वहां से हरी झंडी मिलते ही काम शुरू हो जाएगा।
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उनकी खुशबू से मंदिर गमकेंगे। इतना ही नहीं, मंदिरों के निर्माल्य (माला-फूल) के प्रबंधन से होने वाली आय से समाज में हाशिए पर जीने वालों की जिंदगी भी संवारी जाएगी। राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत मंदिरों के निर्माल्य से अगरबत्ती और रंग बनाया जाएगा जबकि अन्य पूजन सामग्री के अवशेष से ऐसी वस्तुएं बनेंगी, जिनका सड़क निर्माण में इस्तेमाल होगा।
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जिला नगरीय विकास अभिकरण (डूडा) ने इसका प्रस्ताव शासन को भेजा है।
काशी विश्वनाथ, गौरी केदारेश्वर, त्रिदेव मंदिर, चिंतामणि गणेश मंदिर, खांटू श्याम मंदिर और मौनी बाबा आश्रम से रोजाना साढ़े चार टन फूल-मालाएं निकलती हैं। इस निर्माल्य को एकत्रित करके भागीरथी सेवार्चन समिति जैविक खाद बनाती है। काशी में लगभग 1700 मंदिर हैं।
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मोटे अनुमान के मुताबिक इन मंदिरों में रोजाना 65 से 70 टन फूल-मालाएं भक्त अर्पित करते हैं जबकि पर्व त्योहार पर मंदिरों के शृंगार और उत्सव स्थल की सजावट में 125 से 150 टन फूल का इस्तेमाल होता है। अगले दिन ज्यादातर फूल-मालाओं को यूं ही फेंक दिया जाता है। डूडा ने मंदिरों से निकलने वाले निर्माल्य से लोगों की आजीविका तलाशने का उपक्रम शुरू किया है।
डूडा के परियोजना निदेशक कंचन सिंह परिहार ने बताया कि दिल्ली की संस्था सोसाइटी फार चाइल्ड डेवलपमेंट की मदद से फूलों के रंग और खुशबू के सत्व निकाले जाएंगे और उनसे बचने वाले अन्य सामग्री का इस्तेमाल करके अगरबत्तियां बनाई जाएंगी। संस्था इस काम से होने वाली आय से 500 निशक्त बच्चों के अलावा सेक्स वर्करों का पुनर्वास करेगी।
इसके अलावा मंदिरों के पूजन सामग्री, प्लास्टिक, पत्तियों और फलों को इस तरह बदला जाएगा कि उनका इस्तेमाल सड़क निर्माण और दूसरे कामों में हो सके। लखनऊ की संस्था युग एसोसिएट्स इस मामले में तकनीकी सहायता मुहैया कराएगी। इससे कचरा बीनने वालों और स्लम में रहने वालों को रोजगार मुहैया कराया जाएगा। योजना मंजूरी के लिए शासन को भेज दी गई है। वहां से हरी झंडी मिलते ही काम शुरू हो जाएगा।