बाबा विश्वनाथ के दरबार में अब सजेगी महफिल, हर शाम सुर-लय-ताल से आराधना
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बनारस घराने में अब संगीत के जनक नटराज शिव यानी बाबा विश्वनाथ के दरबार से भारतीय संगीत को नई दिशा मिलेगी। स्वर्ण शिखरों वाले बाबा के मुक्तांगन में वेद मंत्रों और ऋचाओं के गान तो गूंजते रहे हैं।
अब यहां शास्त्रीय संगीत की तीनों प्रमुख विधाओं गायन, वादन और नृत्य से प्रतिदिन आराधना की योजना है। सुरक्षा की दृष्टि से अभी तक मंदिर में संन्यासियों को कमंडल तक नहीं ले जाने दिया जाता है लेकिन इस योजना को साकार करने के लिए मंदिर प्रशासन नियमों में ढील देगा।
नई व्यवस्था से संगीत के शहर बनारस में बाबा के दरबार से नए कलाकारों को मंच के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत को प्रोत्साहन भी मिलेगा। काशी विश्वनाथ मंदिर में नृत्य-संगीत की परंपरा नहीं रही है। बाबा के आंगन में संगीतांजलि नई शुरुआत होगी।
योजना के तहत दोपहर बाद तीन से शाम 6:30 बजे तक गर्भगृह के पूर्वी द्वार के सामने तारकेश्वर मंदिर परिसर में संगीत प्रस्तुतियों के लिए मंच लगेगा। मंडलायुक्त नितिन रमेश गोकर्ण ने मंदिर प्रशासन के अधिकारियों के साथ बैठक कर इस योजना को मई के अंत तक मूर्त रूप देने का निर्देश दिया है।
चूंकि भगवान शिव नटराज कहे जाते हैं, इसलिए शुरुआत भरतनाट्यम नृत्य से होगी। 25 या 26 मई को कर्नाटक के नर्तक रमन और उनके सहयोगी भरतनाट्यम में शिव-पार्वती विवाह की प्रस्तुति देंगे। आगे आने वाले दिनों में गायन, वादन और नृत्य की शास्त्रीय विधाओं की प्रस्तुतियों के लिए मंदिर प्रशासन को कई जाने-माने कलाकारों के आवेदन मिले हैं।
शिव के डमरू से निकले संगीत के सात स्वर : पद्मभूषण पं. छन्नूलाल
पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र बताते हैं कि संगीत के सात स्वर भगवान शिव के डमरू से निकले हैं। शिव महापुराण के अनुसार शिव से पहले संगीत गायन, वादन, नृत्य कोई नहीं जानता था। पुराणों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मनाद से ही शिव प्रकट हुए।
नाद और भगवान शिव का अटूट रिश्ता है। दरअसल, नाद एक ऐसी ध्वनि है जिसे ‘ऊं’ कहा जाता है। संगीत के सात स्वरों के केंद्रीय स्वर नाद में ही स्थित हैं। इसलिए बाबा विश्वनाथ के मंदिर से शास्त्रीय संगीत की शुरुआत कला जगत के लिए बहुत बड़ी बात है।
ठुमरी गायिका पद्मविभूषण गिरिजा देवी ने कहा कि यह सुखद है कि बाबा विश्वनाथ के मंदिर में रोजाना संगीत होगा। नटराज भगवान शिव का ही रूप हैं। संगीत वहीं है, जहां शिव हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन की यह योजना संगीतकारों के लिए वरदान साबित होगी।
कथक नृत्य गुरु पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज ने कहा कि लास्य शैली में भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी और कथक नृत्य आता है, जबकि कथकली तांडव नृत्य से प्रेरित है। बाबा के मंदिर में शिव आराधना के रूप में संगीत साधना भारतीय संगीत के लिए उपलब्धि होगी।
काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एसएन त्रिपाठी ने कहा कि संगीत के दिन-प्रतिदिन चलने वाले कार्यक्रम के लिए देश के विख्यात कलाकारों के आवेदन आए हैं। सभी की सीडी का परीक्षण कराने के बाद कलाकारों को मौका दिया जाएगा। योजना को साकार करने के लिए मिर्जापुर मठ की खाली जमीन पर स्थायी मंच का निर्माण कराया जाएगा। मंदिर प्रशासन साउंड सिस्टम कलाकारों को उपलब्ध कराएगा।