Dev Diwali 2020: देव दीपावली पर बाबा विश्वनाथ भी करते हैं दीपदान, दीपदान से मिलती है मोक्ष की प्राप्ति
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शिव की नगरी काशी में देव दीपावली का उत्साह अलग स्वरूप में नजर आता है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा पर काशीपुराधिपति स्वयं देवताओं के साथ गंगा तट पर दीपदान करते हैं। इसलिए भी इसको देव दीपावली कहा जाता है।
काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष प्रो. रामयत्न शुक्ल ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया था। तारकासुर के वध के बाद उसके तीनों बेटों ने देवताओं से बदला लेने का फैसला कर लिया। उन्होंने ब्रह्मा जी की तपस्या की। वरदान मांगा कि आप हमारे लिए त्रिपुर (नगर) का निर्माण कर दें।
जब ये त्रिपुर अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में आ जाएं, तब असंभव रथ, असंभव बाण से बिना क्रोध किए ही उनका वध हो सके। वर प्राप्त करने के बाद उन्होंने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया और उन्हें स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। सभी देवी देवता त्रिपुरासुर से बचने के लिए भगवान शिव की शरण में पहुंचे।
जब तीनों ‘पुर’ एक साथ आए, तब भगवान शिव ने त्रिपुरासुर (तारकासुर के तीनों बेटों) का वध किया। इसी खुशी में सभी देवता भगवान शिव की नगर काशी में पधारे और दीप दान किया। माना जाता है कि तभी से काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली मनाने की परंपरा चली आ रही है।
दीपदान से होती है मोक्ष की प्राप्ति
काशी विद्वत परिषद के मंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार, माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु चर्तुमास की निद्रा से जागते हैं और चतुर्दशी के दिन भगवान शिव और सभी देवी देवता काशी में आकर दीप जलाते हैं। यदि इस दिन कोई व्यक्ति सच्चे मन से काशी में दीप जलाता है और भगवान से प्रार्थना करता है तो उसके जीवन की सभी इच्छाएं पूर्ण होती है और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि नदी, घाट और सरोवरों पर दीप जलाने की मान्यता मत्स्यावतार से जुड़ी है। पूजन के साथ ही व्रत की पूर्णिमा 29 नवंबर रविवार और स्नान दान की पूर्णिमा 30 नवंबर को होगी। मान्यता है कि इस दिन महादेव ने त्रिपुरासुर का वध किया था और शिव जी के आशीर्वाद से दुर्गा रूपी पार्वती जी ने महिषासुर का वध करने के लिए शक्ति अर्जित की थी। मान्यता है कि इस दिन सायं काल भगवान श्री विष्णु मत्स्य अवतार के रूप में अवतरित हुए थे।
ज्योतिषाचार्य राहुल तिवारी ने बताया कि ब्रह्म मुहूर्त में उठकर आराध्य देवी देवता की पूजा अर्चना के पश्चात कार्तिक पूर्णिमा के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। स्नान कर देव दर्शन करना चाहिए। दीप प्रज्ज्वलित करके आकर्षक मालिका सजाने की भी परंपरा है।
नदियों और सरोवरों में इस दिन दीपदान किया जाता है। पीपल और तुलसी के पौधों के पास भी दीपक जला कर पूजन किया जाता है। प्रतीक के रूप में दान का भी विधान है। फलाहार ग्रहण करके श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा से अभीष्ट की प्राप्ति होती है। धर्म शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन किए गए दान का फल यज्ञ के समान बताया गया है।