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महामना ने आयुर्वेद का मान बढ़ाया
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 28 Oct 2016 02:04 AM IST
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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
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महामना के मन मस्तिष्क में जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की परिकल्पना आकार ले रही थी, उसके समानांतर पूर्वांचल और आसपास के जिलों के लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं देने का प्रयास भी चल रहा था। इसी सोच और कोशिश से पूर्वांचल के चरक का जन्म हुआ जिसे हम सब सर सुंदरलाल अस्पताल के नाम से जानते हैं। ऐसा अस्पताल जो पूर्वांचल से लेकर बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ ही नहीं, नेपाल तक के मरीजों के उम्मीद की किरण है। इस अस्पताल को कई बार एम्स बनाने की मांग उठ चुकी है।
महामना हमेशा कहते थे, स्वस्थ शरीर में ही विचार और प्रयास दोनों बसते हैं। सुश्रुत और धनवंतरि की इस नगरी में महामना ने आयुर्वेद को पूरा मान देते हुए यहां शुरुआत में ही विज्ञान व कला की पढ़ाई के साथ ही आयुर्वेद की शिक्षा भी प्रारंभ की। बीएचयू की स्थापना के आठ साल बाद 1924 में महामना ने 100 विस्तर का अस्पताल भी विश्वविद्यालय में शुरू करा दिया था। 1927 में यहां सबसे पहले आयुर्वेद कॉलेज की स्थापना महामना की कोशिशों और महाराजा दरभंगा के तीन लाख रुपये के दान से हुई। देश में पहली बार बीएचयू में एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री की पढ़ाई आयुर्वेद छात्रों के लिए शुरू हुई। मशहूर चिकित्सक कविराज धर्मदास यहां के पहले प्रिंसिपल हुए। 1960 में यहां एमबीबीएस शुरू हुआ। आयुर्वेद में वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ पीजी की पढ़ाई भी इसी दौर में शुरू हुई।
1960 में मॉडर्न मेडिसिन के नौ और आयुर्वेद के आठ विभागों के साथ कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस की शुरुआत हुई। 1971 में इसे संस्थान का दर्जा मिला। मॉडर्न मेडिसिन, आयुर्वेद और दंत चिकित्सा के 48 विभाग और नर्सिंग कॉलेज का ये संस्थान है। सर सुंदरलाल अस्पताल आज 1500 बेड का है। अब यहां 334 बेड का ट्रॉमा सेंटर भी है। स्टेम सेल एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट रिसर्च सेंटर की नींव भी रखी जा चुकी है।
महामना हमेशा कहते थे, स्वस्थ शरीर में ही विचार और प्रयास दोनों बसते हैं। सुश्रुत और धनवंतरि की इस नगरी में महामना ने आयुर्वेद को पूरा मान देते हुए यहां शुरुआत में ही विज्ञान व कला की पढ़ाई के साथ ही आयुर्वेद की शिक्षा भी प्रारंभ की। बीएचयू की स्थापना के आठ साल बाद 1924 में महामना ने 100 विस्तर का अस्पताल भी विश्वविद्यालय में शुरू करा दिया था। 1927 में यहां सबसे पहले आयुर्वेद कॉलेज की स्थापना महामना की कोशिशों और महाराजा दरभंगा के तीन लाख रुपये के दान से हुई। देश में पहली बार बीएचयू में एनाटॉमी, फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री की पढ़ाई आयुर्वेद छात्रों के लिए शुरू हुई। मशहूर चिकित्सक कविराज धर्मदास यहां के पहले प्रिंसिपल हुए। 1960 में यहां एमबीबीएस शुरू हुआ। आयुर्वेद में वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ पीजी की पढ़ाई भी इसी दौर में शुरू हुई।
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1960 में मॉडर्न मेडिसिन के नौ और आयुर्वेद के आठ विभागों के साथ कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस की शुरुआत हुई। 1971 में इसे संस्थान का दर्जा मिला। मॉडर्न मेडिसिन, आयुर्वेद और दंत चिकित्सा के 48 विभाग और नर्सिंग कॉलेज का ये संस्थान है। सर सुंदरलाल अस्पताल आज 1500 बेड का है। अब यहां 334 बेड का ट्रॉमा सेंटर भी है। स्टेम सेल एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट रिसर्च सेंटर की नींव भी रखी जा चुकी है।
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