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अगस्त क्रांतिः आज ही के दिन बलिया ने ब्रिटिश हुकूमत को थर्राया था, जानिए वो कहानी

Thu, 10 Aug 2017 03:51 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला,बलिया
ब्यूरो, अमर उजाला,बलिया Updated Thu, 10 Aug 2017 03:51 PM IST
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august kranti: today is the day when land of ballia protest british
अगस्त क्रांति - फोटो : logo
 देश भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ लेकिन बलिया पांच साल पहले 1942 में ही आजाद हो गया था।  हालांकि यह आजादी महज 13 दिनों तक ही रही लेकिन बलिया की धरती से आजादी के दिवानों ने ब्रिटिश हुकूमत के छक्के छुड़ा दिए थे। नौ अगस्त को शुरू हुई क्रांति ज्वाला धीरे-धीरे धधकने लगी थी।
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आंदोलन करने वाले बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। बम्बई में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल आदि नेताओं को पकड़ कर आगा खां महल में नजरबंद कर दिया गया था। इसकी जानकारी होने के बाद 10 अगस्त को भोर में ही लोग घरों से लालटेन लेकर निकल पड़े ।
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जगह-जगह युवकों ने महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में शहर बंद रखने और जुलूस निकालने की घोषणा करने लगे। करीब आठ बजे ओक्डेनगंज चौराहा पर उमाशंकर ने भाषण दिया। इसके बाद शहर में जुलूस निकालने और हड़ताल का एलान किया गया।
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इनके सहयोग में सूरज प्रसाद अवध किशोर प्रसाद आदि भी थे। चौराहा से जुलूस जब रेलवे स्टेशन पहुंचा तो एक ट्रेन आ गई, जिससे उतरे छात्र भी जुलूस में शामिल हो गए। आलम यह रहा कि जुलूस चलता गया और लोगों की तादाद बढ़ती गई।

गौरीशंकर राय, योगेन्द्र मिश्र, वासुदेव राय आदि की अगुवाई में विभिन्न छात्रावासों के छात्र भी जुलूस में शामिल हो गए। जुलूस जब मालगोदाम पहुंचा तो कम्युनिस्ट नेता विश्वनाथ मर्दाना की ललकार पर मालगोदाम पर काम करने वाले मजदूर भी जुलूस में शामिल हो गए।

कचहरी जाकर जुलूस समाप्त हो गया। आजादी के दिवानों ने ताकत दिखाकर ब्रिटिश सिपाहियों को बैकफुट पर ला दिया था। 

सेनानियों की पत्नी रखती थीं मिर्च का पाउडर

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तिरंगा - फोटो : google
वर्ष 1942 के अगस्त क्रांति की बयां ऐसे तो बलिया जिले के प्रत्येक लोग करते हैं लेकिन इसकी आंखों देखी बयां सेनानी पं. महानंद मिश्र की पत्नी श्रीमती राधिका मिश्र भी बताती हैं। हालांकि श्रीमती मिश्र की उम्र 95 साल से अधिक हो चुकी है लेकिन जब वह क्रांति की बात शुरु करती हैं तो मानों वर्ष 1942 की ही सेनानी पत्नी हैं।

बताया कि ऐसे तो 1942 के पहले से ही लोग आंदोलित थे। आज के जमाने की तरह रेडियो, टेलीविजन, अखबार आदि नहीं थे, इसके बावजूद महात्मा गांधी की ओर से शुरू किए गए आंदोलन की पल-पल की जानकारी सेनानी किसी न किसी तरह जुटा लेते थे।

कहा कि पंडित जी आए दिन किसी न किसी कार्यक्रम में जाते थे और यही हाल अधिकांश सेनानियों का था। घर में महिलाएं भी ब्रिटिश हूकूमत के कारिंदों से मुकाबला करने के लिए तैयार रहती थीं।

बताया कि महिलाओं का सबसे बड़ा हथियार मिर्च पाउडर था। भले ही श्रीमती मिश्रा ठीक से नहीं बोल पा रही हैं और अधिक उम्र के कारण जुबां लडख़ड़ा रही है लेकिन अंदर की भावना को वह नहीं रोक पा रही हैं।

बताया कि हम महिलाएं भी पूरी रात चैन से नहीं सोते थे और हमेशा ब्रिटिश सिपाहियों के धमकने की चिंता सताती थी। इसको देखते हुए हमलोग घरों में लाल मिर्च पिस कर रखते थे ताकि जरुरत पडने पर ब्रिटिश सिपाहियों के आंखों में झोंक कर अपना बचाव कर सकें।
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