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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Ancestors of Kashi When IAS was rebuked for suspending TC Pt. Kamlapati grandson narrated unique story

काशी के पूर्वज: जब टीसी को सस्पेंड करने के लिए IAS को पड़ी डांट, पं. कमलापति के पाैत्र ने सुनाया अनोखा किस्सा

Sun, 14 Sep 2025 04:35 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sun, 14 Sep 2025 04:35 PM IST
सार

पंडित कमलापति त्रिपाठी के पौत्र व पूर्व एमएलसी राजेशपति ने अपने दादा के कई अनोखे किस्से बताएं। उन्होंने बताया कि बाबूजी अपने काम को बहुत ही शिद्दत के साथ करते थे। 

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Ancestors of Kashi When IAS was rebuked for suspending TC Pt. Kamlapati grandson narrated unique story
पंडित कमलापति त्रिपाठी और उनके पाैत्र राजेश पति। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पितामह पंडित कमलापति त्रिपाठी हमारे आदर्श थे, उनका वंशज होने पर गर्व है। काशी की सनातनी जनसंस्कृति को उन्होंने जिया, काशी भी उनमें अपना गौरव देखती थी। दिल्ली में घर में खाने के वक्त मैंने सबको एक वाकया सुनाया और सब हंसे। रेलमंत्री के रूप में बाबू के सहायक आईएएस जेएन मिश्र भी चुपचाप सुन रहे थे। दफ़्तर जाकर उन्होंने उस टीसी को ट्रेस करा लिया और उसे सस्पेंड कर दिया। टीसी अफसरों के यहां दौड़ा। 

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वहां से जवाब मिला कि रेलमंत्री ही कोई मदद कर सकते हैं। वह रेल भवन आकर उस गेट के किनारे खड़ा रहता, जहां मंत्री का गेट था। बाबू ने दो दिन गौर किया कि ये व्यक्ति निरीह भाव से खड़ा रहता है, तो उन्होंने पूछ ही लिया। रोते हुए उस टीसी ने मिले निरपराध दंड की जानकारी दी। बाबू उसे साथ लेकर ऊपर गए। उसकी बहाली का तुरंत आदेश कराया और क्षमा मांगी। आईएएस लंच के लिए घर आए, तो मैं भी मौजूद था, उन्हें खूब डांट पड़ी। 
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बाबू जी ने कहा कि आरक्षण बिना यात्रा करोगे और हमारे कर्मचारी को ड्यूटी करने पर निलंबित भी करा लोगे। मैं तो अवाक, क्योंकि मुझे कुछ पता ही नहीं था। यहीं वजहें थीं कि बाबू जिस विभाग में भी मंत्री रहे, जबरदस्त पकड़ के लिए, अफसरों से कठिन से कठिन टास्क पूरा करा लेने के लिए जाने जाते थे। 

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अपने काम की छोड़ी छाप

विभागीय अफसरों, कर्मियों में उनके निर्देश, आदेश क्या, इशारों पर कार्य संपादन हो जाता था। यही कारण है कि अपने क्षेत्र चंदौली, बनारस, उत्तर प्रदेश या केंद्र सरकार में विकास के कामों की ऐसी छाप छोड़ी, जिसके लिए आधी सदी बाद की पीढ़ियां ही उन्हें शिद्दत से, श्रद्धा से याद करती हैं। 

आज धन आधारित राजनीति का बड़ा बोलबाला है, पर बाबू ने तो सदा जन आधारित राजनीति की। पच्चीसों मील पैदल चल चल कर भी गांव-गांव घूमना एवं गांधी का संदेश पहुंचाना। जैसे पारस को छूकर सोना बन जाता है, वैसे ही गांधी से जुड़ कर आम आदमी भी बड़े बन गये, बाबू भी उनमें थे। हमें भी ईमानदारी से जीने की नसीहतें दीं। बीएचयू से पढ़ाई के बाद एक बार कलकत्ते गया और लौटने का आरक्षण न था। 

बाबूजी के निधन से काफी दुखी हुए राजेश पति

ट्रेन की स्लीपर बोगी में चढ़ गया। उम्रदराज बंगाली कंडक्टर ने चेक किया तो नीचे उतारने को कहा। मिन्नत से नहीं माना, तो मैंने कहा कि मेरे दादा ही रेलमंत्री हैं। और भड़क कर उन्होंने अगले स्टेशन पर धक्का दे उतार दिया।

वह परंपरावादी सनातनी पंडित थे, तो आधुनिक एवं सेकुलर साख वाले राजनेता, पत्रकार एवं लेखक भी। संकल्प शक्ति के बड़े धनी थे। पेरोल पर बीमार धर्मपत्नी को देखने जेल से आए थे और उसी दिन सहसा हमारी दादी का निधन भी हुआ। उन्हें बच्चों का ध्यान का वचन दिया, तो उनकी आम खाने की अंतिम इच्छा नहीं पूरी कर सके। तभी उनके अप्रत्याशित निधन ने 29 की उम्र में विधुर बना दिया। 

तब दो संकल्प लिए कि विवाह नहीं करूंगा और जीवन में कभी आम नहीं खाऊंगा। कुल 85 वर्ष की उम्र तक जिए, पर दबावों एवं छोटे पांच बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी के बावजूद न तो फिर विवाह किया और न कभी प्रिय फल आम को हाथ लगाया। यह संकल्पशक्ति निजी जीवन में ही नहीं, सार्वजनिक जीवन में दल, सिद्धांत, विचारधारा, नेतृत्व सभी की एकनिष्ठा से उन्हें जोड़े रही।

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