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बनारस के मिल्लत की पहचान हैं चार कुतुब
Varanasi
Updated Tue, 08 May 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। मजहबी शहर बनारस में कदम-कदम पर अगर देवी-देवताओं के मंदिर हैं तो गली-कूंचे में औलिया इकराम के आस्ताने भी हैं। इनमें कुछ ऐसे दर भी हैं जहां हिंदू और मुसलमान दोनों अदब से हाजिरी लगाते हैं। जायरीनों की मानें तो काशी के चारों कोनों पर कुछ ऐसे बुजुर्गानेदीन मौजूद हैं जिनसे इस शहर की हिफाजत तो हो ही रही है, गंगा-जमुनी तहजीब भी कायम है। इन बुजुर्गानेदीन को बनारस का कुतुब भी कहा जाता है।
शहर की चारों दिशाओं कचहरी स्थित हजरत लाटशाही रहमतुल्ल्लाह अलैह, राजघाट स्थित हजरत चंदन शहीद रह., नगवां स्थित हजरत याकूब शहीद रह. और मंडुवाडीह स्थित हजरत शाह तैयब बनारसी रह. शामिल हैं। मुफ्ती मौलाना हारुन रशीद नक्शबंदी की मानें तो बुजुर्गानेदीन ने हमेशा एकता का पैगाम दिया। मिल-जुलकर रहने की नसीहत दी और इस शहर की तहजीब बचाने की कोशिशों में लगे रहे। इस्लामिक फाउंडेशन के अध्यक्ष एसएम खुर्शीद कहते हैं कि गंगा-जमुनी तहजीब देने वाले इन आस्तानों से लोगों की मुरादें तो पूरी होती हैं साथ ही इनके जरिये बड़ी से बड़ी परेशानियां आसानी से दूर हो जाती हैं।
हजरत शाह तैयब बनारसी
मंडुवाडीह स्थित शाह तैयब बनारसी रहमतुल्लाह अलैह का वंश सऊदी अरब से है। दसवीं सदी में जब वह अपने दादा सैयद सलीम अहमद फारुकी के साथ बनारस आए तो यहां के मुसलमान गुमराह में थे। ऐसे में उन्होंने लोगों को एकता और मिल्लत का पैगाम दिया। बाद में उन्हें बनारस इतना भाया कि वे यहीं के होके रह गए। मान्यता है कि इनके दर पर हाथ फैलाने वाला कोई भी सवाली खाली नहीं लौटता।
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हजरत लाटशाही बाबा
सर्किट हाउस स्थित सैयद मुख्तार लाट शाही बाबा का आस्ताना लोगों की आस्था का केंद्र है। गाजीपुर से 1742 में बनारस आने वाला ये बाबा महाराजा चेतसिंह की सेना में सिपहसालार थे। महाराज ने उन्हें शिवपुर रियासत का शहर काजी नियुक्त किया था। उनका फैसला देशभर में मशहूर था। जब अंग्रेजी सेना से राजा चेतसिंह और उनके परिवार घेरा था तो उन्होंने महाराजा बनारस के परिवार को अंग्रेजों के चंगुल से भी बचाया था और इस दौरान वे शहीद भी हो गए। बाबा के आस्ताने से आज भी कोई खाली नहीं जाता।
हजरत याकूब शहीद
नगवां इलाके में मौजूद हजरत याकूब के आस्ताने पर हिंदू और मुसलमान दोनों बड़ी अकीदत के साथ हाजिरी लगाते हैं। ये संत 11वीं सदी में बनारस तशरीफ लाए तो फिर यहीं रह गए। मुगलकालीन तारीख देखी जाए तो महमूद गजनवी के समय में कई सूफी संत बनारस आए और उन्होंने लोगों को खुदा और एकेश्वरवाद का पैगाम दिया। इसी सिलसिले में हजरत याकूब भी बनारस आए थे।
हजरत चंदन शहीद
हजरत चंदन शहीद रहमतुल्लाह अलैह के दर पर सभी मजहब के लोग हाजिरी लगाते हैं। इनमें हिंदू अधिक हैं। कहा जाता है कि वे काबुल से सन् 1300 में बनारस आए थे। शाबान के महीने में लगने वाले उर्स में पूरे पूर्वांचल के लोग यहां हाजिरी लगाकर मन्नतें मांगते और चादर चढ़ाते हैं।
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शहर की चारों दिशाओं कचहरी स्थित हजरत लाटशाही रहमतुल्ल्लाह अलैह, राजघाट स्थित हजरत चंदन शहीद रह., नगवां स्थित हजरत याकूब शहीद रह. और मंडुवाडीह स्थित हजरत शाह तैयब बनारसी रह. शामिल हैं। मुफ्ती मौलाना हारुन रशीद नक्शबंदी की मानें तो बुजुर्गानेदीन ने हमेशा एकता का पैगाम दिया। मिल-जुलकर रहने की नसीहत दी और इस शहर की तहजीब बचाने की कोशिशों में लगे रहे। इस्लामिक फाउंडेशन के अध्यक्ष एसएम खुर्शीद कहते हैं कि गंगा-जमुनी तहजीब देने वाले इन आस्तानों से लोगों की मुरादें तो पूरी होती हैं साथ ही इनके जरिये बड़ी से बड़ी परेशानियां आसानी से दूर हो जाती हैं।
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हजरत शाह तैयब बनारसी
मंडुवाडीह स्थित शाह तैयब बनारसी रहमतुल्लाह अलैह का वंश सऊदी अरब से है। दसवीं सदी में जब वह अपने दादा सैयद सलीम अहमद फारुकी के साथ बनारस आए तो यहां के मुसलमान गुमराह में थे। ऐसे में उन्होंने लोगों को एकता और मिल्लत का पैगाम दिया। बाद में उन्हें बनारस इतना भाया कि वे यहीं के होके रह गए। मान्यता है कि इनके दर पर हाथ फैलाने वाला कोई भी सवाली खाली नहीं लौटता।
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हजरत लाटशाही बाबा
सर्किट हाउस स्थित सैयद मुख्तार लाट शाही बाबा का आस्ताना लोगों की आस्था का केंद्र है। गाजीपुर से 1742 में बनारस आने वाला ये बाबा महाराजा चेतसिंह की सेना में सिपहसालार थे। महाराज ने उन्हें शिवपुर रियासत का शहर काजी नियुक्त किया था। उनका फैसला देशभर में मशहूर था। जब अंग्रेजी सेना से राजा चेतसिंह और उनके परिवार घेरा था तो उन्होंने महाराजा बनारस के परिवार को अंग्रेजों के चंगुल से भी बचाया था और इस दौरान वे शहीद भी हो गए। बाबा के आस्ताने से आज भी कोई खाली नहीं जाता।
हजरत याकूब शहीद
नगवां इलाके में मौजूद हजरत याकूब के आस्ताने पर हिंदू और मुसलमान दोनों बड़ी अकीदत के साथ हाजिरी लगाते हैं। ये संत 11वीं सदी में बनारस तशरीफ लाए तो फिर यहीं रह गए। मुगलकालीन तारीख देखी जाए तो महमूद गजनवी के समय में कई सूफी संत बनारस आए और उन्होंने लोगों को खुदा और एकेश्वरवाद का पैगाम दिया। इसी सिलसिले में हजरत याकूब भी बनारस आए थे।
हजरत चंदन शहीद
हजरत चंदन शहीद रहमतुल्लाह अलैह के दर पर सभी मजहब के लोग हाजिरी लगाते हैं। इनमें हिंदू अधिक हैं। कहा जाता है कि वे काबुल से सन् 1300 में बनारस आए थे। शाबान के महीने में लगने वाले उर्स में पूरे पूर्वांचल के लोग यहां हाजिरी लगाकर मन्नतें मांगते और चादर चढ़ाते हैं।