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गुरुजन, संस्कृत जगत को समर्पित है यह सम्मान : प्रो. त्रिपाठी
Updated Fri, 26 Jan 2018 02:40 AM IST
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वाराणसी। इस अलंकरण का श्रेय मैं अपने गुरुजन और संस्कृत जगत को समर्पित करता हूं। विश्व में संस्कृत, पाली और प्राकृत की पांडुलिपियों का दुर्लभ संग्रह है। उनके उद्धार से नूतन इतिहास पर प्रकाश पड़ेगा। लंदन की इंडिया आफिस लाइब्रेरी में संस्कृत पांडुलिपियों की अपार संपदा सुरक्षित है। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह अपनी इस अलभ्य संपदा को भारत में लाए और उसका अनुवाद कराएं। यह कहना है पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामित प्रो. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी का।
वागीश शास्त्री उपनाम से विख्यात प्रो. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी (84) ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान संस्थान के निदेशक और प्रोफेसर के पद पर 1970 से 1996 तक कार्य किया है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान संस्थान के निदेशक के रूप में प्रो. त्रिपाठी ने कई ग्रंथमालाओं का संपादन किया तथा संस्कृत, पालि और प्राकृत भाषा की पांडुलिपियों का पुनरुद्धार किया। इसके अलावा नेपाल के शाही दरबार ग्रंथालय की बहुत सी तांत्रिक पांडुलिपियों का छायांकन कराया।
वर्तमान में शिवाला में ही इनका निवास स्थान है। भारतीय संस्कृति के विश्वकोष पुराणों पर महापुराण कोष योजना प्रारंभ की और वामनपुराणविषयानुक्रमकोष की रचना तथा संपादन किया। उन्होंने 1983 में वाग्योगचेतनापीठम की स्थापना की और ये सरल वाग्योग विधि से बिना रटे पाणिनीय व्याकरण का ज्ञान देते हैं। इन्होंने पाणिनीय व्याकरण पर चार पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने अपनी वैदूष्यपूर्ण विश्लेषण से रामसेतु की समस्या का भी समाधान किया है। तीन दशक तक संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान निदेशक के रूप में इन्होंने 150 दुर्लभ पांडुलिपियों का संपादन और प्रकाशन कराया।
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मिले सम्मान
श्री पंडित परिषद की ओर से 1982 में महामहोपाध्याय पुरस्कार
उत्तर प्रदेश हिंदी समिति की ओर से 1966 में कालिदास पुरस्कार
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की ओर से 1995 में बाणभट्ट पुरस्कार
इंदौर में 2004 में स्वामी विष्णुतीर्थ सम्मान
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2014 में यशभारती सम्मान
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की ओर से 2014 में विश्वभारती सम्मान
मैडोना से गवाया था संस्कृत में गीत
वाराणसी। प्रो. त्रिपाठी ने पॉप स्टार गायक मैडोना को संस्कृत का शुद्ध उच्चारण कराकर उनसे एक संस्कृत गीत गवाया था। वाग्योगचेतनापीठम के माध्यम से देश और विदेश के शिष्यों को शिक्षा दे रहे हैं। इसके साथ ही, विदेशी शिष्यों को तंत्रयोग की दीक्षा भी देते हैं।
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वागीश शास्त्री उपनाम से विख्यात प्रो. भागीरथ प्रसाद त्रिपाठी (84) ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान संस्थान के निदेशक और प्रोफेसर के पद पर 1970 से 1996 तक कार्य किया है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान संस्थान के निदेशक के रूप में प्रो. त्रिपाठी ने कई ग्रंथमालाओं का संपादन किया तथा संस्कृत, पालि और प्राकृत भाषा की पांडुलिपियों का पुनरुद्धार किया। इसके अलावा नेपाल के शाही दरबार ग्रंथालय की बहुत सी तांत्रिक पांडुलिपियों का छायांकन कराया।
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वर्तमान में शिवाला में ही इनका निवास स्थान है। भारतीय संस्कृति के विश्वकोष पुराणों पर महापुराण कोष योजना प्रारंभ की और वामनपुराणविषयानुक्रमकोष की रचना तथा संपादन किया। उन्होंने 1983 में वाग्योगचेतनापीठम की स्थापना की और ये सरल वाग्योग विधि से बिना रटे पाणिनीय व्याकरण का ज्ञान देते हैं। इन्होंने पाणिनीय व्याकरण पर चार पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने अपनी वैदूष्यपूर्ण विश्लेषण से रामसेतु की समस्या का भी समाधान किया है। तीन दशक तक संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसंधान निदेशक के रूप में इन्होंने 150 दुर्लभ पांडुलिपियों का संपादन और प्रकाशन कराया।
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मिले सम्मान
श्री पंडित परिषद की ओर से 1982 में महामहोपाध्याय पुरस्कार
उत्तर प्रदेश हिंदी समिति की ओर से 1966 में कालिदास पुरस्कार
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की ओर से 1995 में बाणभट्ट पुरस्कार
इंदौर में 2004 में स्वामी विष्णुतीर्थ सम्मान
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2014 में यशभारती सम्मान
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान की ओर से 2014 में विश्वभारती सम्मान
मैडोना से गवाया था संस्कृत में गीत
वाराणसी। प्रो. त्रिपाठी ने पॉप स्टार गायक मैडोना को संस्कृत का शुद्ध उच्चारण कराकर उनसे एक संस्कृत गीत गवाया था। वाग्योगचेतनापीठम के माध्यम से देश और विदेश के शिष्यों को शिक्षा दे रहे हैं। इसके साथ ही, विदेशी शिष्यों को तंत्रयोग की दीक्षा भी देते हैं।