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यूपी: काशी के आश्रम में सालभर में 55 बुजुर्गों की मौत, अपने सिर्फ बीमा क्लेम और संपत्ति के लिए लेने आए शव

Sun, 27 Sep 2026 08:30 AM IST
Sharukh Khan अभिषेक सेठ, अमर उजाला, वाराणसी
अभिषेक सेठ, अमर उजाला, वाराणसी Published by: Sharukh Khan Updated Sun, 27 Sep 2026 08:30 AM IST
सार

यूपी के वाराणसी से संवेदनहीनता सामने आई है। काशी के आश्रम में सालभर में 55 बुजुर्गों की मौत हो गई। इनके अपने सिर्फ बीमा क्लेम और संपत्ति के लिए शव लेने आए। काशी के अपना घर आश्रम के ये आंकड़े परेशान करने वाले हैं।

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55 elderly residents died Kashi ashram over course of year relatives came to claim bodies solely for insurance
kashi ashram - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

यूपी के वाराणसी में अपना घर आश्रम में रहने वाले 55 बुजुर्गों की पिछले एक साल में मौत हुई है। जब ये जिंदा थे, तब इनके अपनों ने इनकी कभी सुध नहीं ली। खैरियत नहीं पूछी। मौत हो गई तो सिर्फ इसलिए शव लेने आए क्योंकि उसके बिना बीमा क्लेम या संपत्ति पर हक नहीं मिल पाएगा। 
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इनमें से कुछ तो शव लेने भी नहीं आए, अंतिम संस्कार हो जाने के बाद सिर्फ मृत्यु प्रमाणपत्र चाहते हैं। परंपरा है कि जिन अपनों की मौत हो जाती है, उन्हें पितृपक्ष में याद किया जाता है। कुछ लोग जिंदा रहते ही अपने माता-पिता को आश्रम में रहने के लिए छोड़ आते हैं। 
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अपना घर आश्रम के संचालक डॉ. के. निरंजन कहते हैं, अपनों का शव ले जाने के पीछे का असली मकसद संपत्ति का बंटवारा, जमीन की रजिस्ट्री या फिर बीमा क्लेम होता है। जो लोग जीते जी अपनों को देखने तक नहीं आते वे मृत्यु के बाद शव लेने पहुंच जाते हैं। 
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मां बाप का शव या मृत्यु प्रमाण पत्र लेने आए परिजन
दाह-संस्कार करके मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाते हैं और फिर कागजों में उनके अपने होने के सबूत और गवाही देते हैं। मां बाप का शव या मृत्यु प्रमाण पत्र लेने आए परिजन उनकी गठरी, सामान, पैसा, गहने और कपड़े ले जाना नहीं भूलते। हालांकि आश्रम पहले दिन से हर सामान को टैग कर रखता है। बाकायदा फोटो भी खींचता है। 

विडंबना एक और है। महिला की मौत के बाद शव कौन ले जाएगा ये सवाल आता है तो ससुराल, मायका और पति तीनों इन्कार कर देते हैं। जब अपनों को ले जाने या मिलने आने के लिए आश्रम से फोन किया जाता है तो वो बहाने बना देते हैं। ये बहाने यहां रहने वाले पुरुष बुजुर्गों से ज्यादा महिलाओं के हिस्से आते हैं। 

डॉ निरंजन बताते हैं, उनके यहां एक 105 साल की महिला हैं। उन्होंने गोद लेकर सौतेले बेटे को पाला था। जब बेटे से कहा मां से मिलने आ जाओ तो बेटा मुकर गया, बोला - हम चौरसिया हैं, वो ब्राह्मण तो मैं कैसे उनका बेटा हो गया। आश्रम में 275 महिलाएं रहती हैं। 
 

दुबई से आया बेटा, दो दिन बाद ले गया शव
बेनियाबाग के एक बुजुर्ग (65) को लावारिस हालत में सड़क से उठाकर आश्रम में जगह दी गई। वह एक साल से आश्रम में रह रहे थे। बेटा दुबई में नौकरी करता है। बीमार हुए तो पड़ोस में रह रहे एक रिश्तेदार को कई बार सूचना दी गई, लेकिन वह नहीं आए। जब मौत हो गई तो दुबई में रहने वाला बेटा दो दिन बाद आकर शव ले गया।

 

सराफा की तीन दुकानें, पांच बीघा मकान, अंतिम दिन आश्रम में गुजारे
दरभंगा के सराफा कारोबारी (70) परिवार से तंग आकर जीवन के अंतिम दिनों में काशी आ गए। कुछ दिन बाद गंगा किनारे घाट पर बेहोश मिले। उन्हें आश्रम लाया गया। छह महीने गुजारने के बाद उन्होंने बताया कि उनकी तीन सराफा की दुकानें और गांव में पांच बीघा जमीन है। बीमार बुजुर्ग को कोई देखने तक नहीं आया। जब मृत्यु हो गई तो परिजन शव लेने पहुंच गए।
 

50 लाख का बीमा, मरने के अगले दिन बेटा ले गया शव
देवरिया के 60 वर्षीय बुजुर्ग जमींदार परिवार से थे। उन्होंने अपने नाम से 50 लाख रुपये का बीमा करा रखा था। तीन साल से आश्रम में रह रहे थे। बीच में तबीयत खराब होने पर अस्पताल में भर्ती भी कराया गया था। बीमारी की सूचना देने के बाद भी बेटा नहीं आया। लेकिन मौत के अगले दिन ही आकर शव ले गया।
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