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तार बिजली से पतले हमारे पिया...
Updated Sat, 06 Oct 2018 02:16 AM IST
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वाराणसी। बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय में चल रहे तीन दिवसीय इंटरनेशनल सेमिनार लोक संस्कृति संवर्धनम के दूसरे दिन शुक्रवार को जानी मानी लोक गायिका पद्मश्री शारदा सिन्हा ने अपनी गायिकी से दर्शकों का दिल जीत लिया।
पं. ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में सुबह 10 बजे से शारदा ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरूआत देवी गीत ‘जगदंबा घर में दियना बारी अईली हे’ से की। इसके बाद ‘का ‘लेके शिव के मनाइब शिव मानत आही’ के माध्यम से भोले की नगरी काशी में भगवान भोलेनाथ का गुणगान किया। इसके बाद तार बिजली से पतले हमारे पिया’, ‘पटना से वैद्या बुलाई द नजरा गईलें गोईयां’, ‘अमवा महुअवा के झूमे डरिया’ सहित ढेर सारे गीतों की प्रस्तुति पर दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर दिया। संकाय प्रमुख प्रो. राजेश शाह, नृत्य विभाग की अध्यक्ष डॉ. विधि नागर के निर्देशन में हुए कार्यक्रम में तबले पर पंकज राय, बांसुरी पर राकेश कुमार, हारमोनियम पर डॉ. विजय कपूर, ढोलक पर सिकंदर और साइड रिदम पर संजय श्रीवास्तव ने संगत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. हरिराम द्विवेदी, प्रो. शारदा वेलंकर ने किया। इससे पहले डॉ. भावना ग्रोवर, राखी अग्रवाल, डॉ. विद्या शिमरलका और प्रो. पारुल शाह ने शोध पत्र पढ़े।
दूसरे सत्र में मणिपुर से आए मुकुल राभा और कलाकारों ने बिहू नृत्य की प्रस्तुति की। इसमें उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न समुदायों के गीत एवं नृत्य को प्रयोग के द्वारा समझाने का प्रयास किया। नेपाल से आए डॉ. रमेश पोखरैल ने नेपाल की लोकसंगीत, नृत्य ताभांग सेलो, टप्पा, मारूनी और कृष्ण चरित की प्रस्तुति कर इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी। इसमें सुजाता बराल, स्वजन रघुवंशी, अस्मिता, पवन थापा, आरती थापा, कोइराला और नेहा पोखरैल ने नृत्य प्रस्तुत किया। थाइलैंड के कलाकारों ने रामायणम की प्रस्तुति की। कार्यक्रम का संचालन सौरभ चक्रवर्ती ने किया। इस दौरान प्रो. संगीता पंडित, प्रो.वीरेंद्र नाथ मिश्रा, प्रो. के शशि कुमार, डॉ. ज्ञानेश चंद्र पांडेय, डॉ. मधुमिता भट्टाचार्या, डॉ. केए चंचल आदि मौजूद रहे।
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परंपराओं को सहेजने की जरूरत
वाराणसी। लोक संस्कृति ही संस्कार और परंपरा है। इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहने की जरूरत है। इसमें युवा कलाकारों की भूमिका अहम है। बीएचयू के पं. ओंकार नाथ ठाकुर सभागार में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आईं शारदा सिन्हा ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अपनी लोक पंरपराओं को भूलकर कभी भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। कहा कि संस्कृति और संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं। आज युवाओं को संस्कार के गीत, त्योहारों पर गाए जाने वाले गीतों के साथ ही पारंपरिक गीतों के बारे में जानकारी नहीं हो पाती है, ऐसे में जरूरी है कि लोक संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण और संवर्द्धन किया जाए। इसमें संगीत से जुड़े शिक्षण संस्थानों से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उन्होंने भोजपुरी फिल्म सोसाइटी के गठन और भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने को जरूरी बताया।
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पं. ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में सुबह 10 बजे से शारदा ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरूआत देवी गीत ‘जगदंबा घर में दियना बारी अईली हे’ से की। इसके बाद ‘का ‘लेके शिव के मनाइब शिव मानत आही’ के माध्यम से भोले की नगरी काशी में भगवान भोलेनाथ का गुणगान किया। इसके बाद तार बिजली से पतले हमारे पिया’, ‘पटना से वैद्या बुलाई द नजरा गईलें गोईयां’, ‘अमवा महुअवा के झूमे डरिया’ सहित ढेर सारे गीतों की प्रस्तुति पर दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर दिया। संकाय प्रमुख प्रो. राजेश शाह, नृत्य विभाग की अध्यक्ष डॉ. विधि नागर के निर्देशन में हुए कार्यक्रम में तबले पर पंकज राय, बांसुरी पर राकेश कुमार, हारमोनियम पर डॉ. विजय कपूर, ढोलक पर सिकंदर और साइड रिदम पर संजय श्रीवास्तव ने संगत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. हरिराम द्विवेदी, प्रो. शारदा वेलंकर ने किया। इससे पहले डॉ. भावना ग्रोवर, राखी अग्रवाल, डॉ. विद्या शिमरलका और प्रो. पारुल शाह ने शोध पत्र पढ़े।
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दूसरे सत्र में मणिपुर से आए मुकुल राभा और कलाकारों ने बिहू नृत्य की प्रस्तुति की। इसमें उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न समुदायों के गीत एवं नृत्य को प्रयोग के द्वारा समझाने का प्रयास किया। नेपाल से आए डॉ. रमेश पोखरैल ने नेपाल की लोकसंगीत, नृत्य ताभांग सेलो, टप्पा, मारूनी और कृष्ण चरित की प्रस्तुति कर इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी। इसमें सुजाता बराल, स्वजन रघुवंशी, अस्मिता, पवन थापा, आरती थापा, कोइराला और नेहा पोखरैल ने नृत्य प्रस्तुत किया। थाइलैंड के कलाकारों ने रामायणम की प्रस्तुति की। कार्यक्रम का संचालन सौरभ चक्रवर्ती ने किया। इस दौरान प्रो. संगीता पंडित, प्रो.वीरेंद्र नाथ मिश्रा, प्रो. के शशि कुमार, डॉ. ज्ञानेश चंद्र पांडेय, डॉ. मधुमिता भट्टाचार्या, डॉ. केए चंचल आदि मौजूद रहे।
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परंपराओं को सहेजने की जरूरत
वाराणसी। लोक संस्कृति ही संस्कार और परंपरा है। इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहने की जरूरत है। इसमें युवा कलाकारों की भूमिका अहम है। बीएचयू के पं. ओंकार नाथ ठाकुर सभागार में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आईं शारदा सिन्हा ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अपनी लोक पंरपराओं को भूलकर कभी भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। कहा कि संस्कृति और संस्कार एक दूसरे के पूरक हैं। आज युवाओं को संस्कार के गीत, त्योहारों पर गाए जाने वाले गीतों के साथ ही पारंपरिक गीतों के बारे में जानकारी नहीं हो पाती है, ऐसे में जरूरी है कि लोक संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण और संवर्द्धन किया जाए। इसमें संगीत से जुड़े शिक्षण संस्थानों से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उन्होंने भोजपुरी फिल्म सोसाइटी के गठन और भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने को जरूरी बताया।