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संघ प्रमुख ने अनुशासन का पाठ पढ़ाया
Updated Wed, 21 Feb 2018 02:40 AM IST
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वाराणसी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत ने पदाधिकारियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाया। स्पष्ट तौर पर समझाया कि संगठन में अहम का कोई स्थान नहीं है। संघ को स्वयंसेवकों का समर्पण ही चलाएगा। संघ के स्वयंसेवकों के लिए मान-अपमान, सुख-दुख, यश-अपयश से परे रहकर अपने ध्येय को प्राप्त करना ही परम कर्तव्य है। हम सब मंत्र समान हैं। संगठन समान हैं। मन, बुद्धि, चित्त और उद्देश्य समान हैं।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ता के बैठक के आखिरी दिन मंगलवार का बड़ा लालपुर के दीनदयाल हस्तकला संकुल में संघ प्रमुख ने अनुषांगिक संगठनों के क्षेत्रीय और प्रांतीय पदाधिकारियों के साथ समन्वय बैठक में कहा कि हमारा स्वयंसेवकत्व और हमारी संघ यात्रा सतत चलती रहती है। हम संघ में आए, यह अच्छी बात है। इससे भी अच्छा है कि संघ हम सब में आए। संगठन में दायित्व आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं। तृतीय सर संघ चालक बाला साहेब देवरस की चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि कक्षा आठ में पढ़ते हुए वह स्वयंसेवक बने थे। उन्होंने अपने प्रभाव से कुरीतियों का प्रतिकार किया था।
संघ प्रमुख ने कहा, स्वयंसेवक होने के नाते आत्मीयता, प्रेम, भक्ति, श्रद्धा आदि सदगुण बढ़ाते रहना चाहिए। नाम, रूप, गुण रहित आत्मीय संबंधों के आधार पर अपने संगठनों का विस्तार करना होगा। विवेकपूर्ण ढंग से कर्तव्य का बोध करना और सामाजिक जीवन में सुधारात्मक प्रयास करते रहना है। स्वयंसेवक अपने घर परिवार से लेकर समाज में संघ संस्कारों के प्रभाव को स्थापित करने का प्रयास करें। संघ के कार्य क्रांतिकारी प्रयास नहीं है। धीरे-धीरे प्रभाव से व्यवस्था परिवर्तन करना है।
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पूर्वी उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ता के बैठक के आखिरी दिन मंगलवार का बड़ा लालपुर के दीनदयाल हस्तकला संकुल में संघ प्रमुख ने अनुषांगिक संगठनों के क्षेत्रीय और प्रांतीय पदाधिकारियों के साथ समन्वय बैठक में कहा कि हमारा स्वयंसेवकत्व और हमारी संघ यात्रा सतत चलती रहती है। हम संघ में आए, यह अच्छी बात है। इससे भी अच्छा है कि संघ हम सब में आए। संगठन में दायित्व आवश्यकता के अनुसार बदलते रहते हैं। तृतीय सर संघ चालक बाला साहेब देवरस की चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि कक्षा आठ में पढ़ते हुए वह स्वयंसेवक बने थे। उन्होंने अपने प्रभाव से कुरीतियों का प्रतिकार किया था।
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संघ प्रमुख ने कहा, स्वयंसेवक होने के नाते आत्मीयता, प्रेम, भक्ति, श्रद्धा आदि सदगुण बढ़ाते रहना चाहिए। नाम, रूप, गुण रहित आत्मीय संबंधों के आधार पर अपने संगठनों का विस्तार करना होगा। विवेकपूर्ण ढंग से कर्तव्य का बोध करना और सामाजिक जीवन में सुधारात्मक प्रयास करते रहना है। स्वयंसेवक अपने घर परिवार से लेकर समाज में संघ संस्कारों के प्रभाव को स्थापित करने का प्रयास करें। संघ के कार्य क्रांतिकारी प्रयास नहीं है। धीरे-धीरे प्रभाव से व्यवस्था परिवर्तन करना है।
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