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सभी जगह नहीं चल पाया ‘विकास का पहिया’

Fri, 24 May 2019 02:31 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 24 May 2019 02:31 AM IST
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सभी जगह नहीं चल पाया ‘विकास का पहिया’
प्रदीप मिश्र
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वाराणसी। विकास कार्यों पर जातिगत जोड़तोड़ भारी पड़ गया। इसका ही नतीजा है कि गाजीपुर में केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के मतदाताओं ने विकास कार्यों को तरजीह ही नहीं दी। वाराणसी और मिर्जापुर के मतदाताओं पर बीते पांच साल में कराए गए विकास कार्यों का प्रभाव दिखा लेकिन आजमगढ़ और चंदौली में जातीय जुगलबंदी हो गई। आजमगढ़ और लालगंज में सपा के शासनकाल में मुख्यमंत्री के तौर पर कराए गए कामों का प्रतिफल अखिलेश को मिला है पर चंदौली के तीन विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की मामूली अंतर से जीत मुमकिन नहीं होती अगर उन्हें वाराणसी जिले के अजगरा और शिवपुर के मतदाताओं और ‘मोदी मैजिक’ का समर्थन नहीं मिलता। वहीं यह भी तय है कि भदोही, घोसी, बलिया और जौनपुर के साथ-साथ मछलीशहर सीट पर फैसला सीधे तौर पर ध्रुवीकरण से ही हुआ।
वाराणसी, आजमगढ़ और मिर्जापुर मंडल की 12 संसदीय सीटों में केवल आजमगढ़ सीट ही ऐसी थी, जहां से सपा के मुलायम सिंह यादव 63,204 वोट से जीते थे। इस बार ‘परिवार’ को बरकरार रखने की जिम्मेदारी अखिलेश ने खुद ली और नतीजा उनके पक्ष में रहा। दूसरी ओर सात सीटों पर ही भाजपा की जीत साबित करती है कि वाराणसी के अलावा जहां भी विकास कार्य हुए, उम्मीदवार तय करने से पहले जातिगत समीकरण साध लिए गए, वहां के प्रत्याशियों को मतदाताओं ने एक बार सिर-आंखों पर बिठा लिया। इसके विपरीत सुभासपा से गठबंधन बरकरार रखने के लिए घोसी सीट पर प्रत्याशी चयन में देर करने से हुआ नुकसान सामने है। भाजपा के सहयोगी दल अपना दल (एस) की अनुुप्रिया ने अपनी पुरानी जीत का रिकार्ड सुधारने के साथ-साथ राबर्ट्सगंज सीट भले ही जीत ली लेकिन सपा-बसपा तालमेल के कारण चुनौतियों ने उनका पीछा आखिर तक नहीं छोड़ा।
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मनोज सिन्हा मान जाते तो जीत जाते
भदोही से वीरेंद्र सिंह मस्त की टिकट काटने और बलिया भेजने से पहले भाजपा हाईकमान मनोज सिन्हा को बलिया से चुनाव लड़ाना चाहता था। हाईकमान को गठबंधन की ओर से अफजाल अंसारी को चुनाव मैदान में उतारे जाने की भनक थी। सिन्हा से कहा गया था कि बलिया में गाजीपुर जिले के भी दो विधानसभा क्षेत्र आते हैं और बलिया उनके लिए सुरक्षित है। सिन्हा पांच साल में कराए गए विकास कार्यों के आधार पर अपना परंपरागत संसदीय क्षेत्र छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। अफजाल के पक्ष में जातीय गणित समझाते हुए उन्हें मनाने और दबाव डालने के साथ ही उन्हें प्रत्याशी देर से बनाया गया। माना जा रहा है कि सिन्हा अगर मान जाते तो उन्हें हार का मुंह नहीं देखना पड़ता।
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बसपा को खूब मिले सपा के वोट
विश्लेषण से पता चलता है कि बसपा प्रत्याशियों को सपा के वोट मिल गए लेकिन सपा प्रत्याशियों को बसपा के वोट ट्रांसफर नहीं हुए। कारण, बसपा के सताए हुए लोगों में बसपाई ही ज्यादा हैं।बलिया में सपा के सनातन पांडेय की 15,519 मतों से पराजय इसका उदाहरण है। इस क्षेत्र में बसपा सुप्रीमो ने सभी भी नहीं की थी। सलेमपुर से गठबंधन प्रत्याशी की सभा में उन्होंने अपील की थी लेकिन सभा केवल अखिलेश की हुई थी। यही नहीं, नीरज शेखर समर्थकों ने खुलेआम भाजपा के वीरेंद्र सिंह मस्त के लिए प्रचार किया। हालांकि सपा को वाराणसी में सपा-बसपा गठबंधन का पूरा फायदा मिला और शालिनी यादव ने 1,9,159 वोट हासिल कर कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय को पछाड़ दिया।
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