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सुभासपा के तेवर भाजपा के लिए चुनौती

Wed, 17 Apr 2019 01:51 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 17 Apr 2019 01:51 AM IST
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सुभासपा के तेवर भाजपा के लिए चुनौती
शशांक मिश्र
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वाराणसी। सुभासपा के भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने के कारण पूर्वांचल की कई सीटों के समीकरण ही नहीं बदलेंगे, नतीजे भी प्रभावित हो सकते हैं। कारण, सुभासपा 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई सीटों पर 18 से 40 हजार मत हासिल कर चुकी है। सुभासपा प्रत्याशियों के घोषणा के बाद भाजपा ने नफा नुकसान का आंकलन शुरू कर दिया है।
पूर्वांचल में भाजपा के लिए अपना दल (एस) के बाद सुभासपा का महत्व है। 2014 और 2017 में अपना दल के साथ मिलकर भाजपा ने पूर्वांचल में बड़ी जीत हासिल की थी। 2017 के विधानसभा चनाव से पहले सुभासपा के साथ भाजपा का गठबंधन हो गया था। इससे पहले सुभासपा मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी।
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वाराणसी सहित कई सीटों पर राजभर समाज का बड़ा वोट बैंक है। 2012 में सुभासपा ने बलिया, गाजीपुर, मऊ और वाराणसी में प्रत्याशी उतारे थे। पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने गाजीपुर की जहूराबाद सीट पर 49600 वोट पाए। इसके अलावा बलिया के फेफना में 42 हजार, रसड़ा में 26 हजार, सिकंदरपुर में 4 हजार, बेल्थरा रोड में पार्टी प्रत्याशी को 38 हजार वोट मिले थे। गाजीपुर, आजमगढ़, और वाराणसी में भी पार्टी उम्मीदवारों को 15 से 20 हजार मत मिले थे।
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2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने समझौते के तहत सुभासपा को आठ सीटें दी थीं। चार सीटों पर सुभासपा जीती। 2017 में ओमप्रकाश दोबारा जहूराबाद से चुनाव लड़े और 86583 वोट पाकर जीते। इनके साथ वाराणसी से अजगरा से कैलाश सोनकर, गाजीपुर के जखनिया से त्रिवेणी राम और रामकोला से रामानंद बौद्ध को भी जीत मिली थी।

राजभर लोकसभा चुनाव में घोसी के साथ ही चंदौली सीट मांग रहे थे। भाजपा ने सीटों पर बात तो नहीं की, मगर सुभासपा के अरविंद राजभर को लघु उद्योग और अजीत प्रताप सिंह को बीज प्रमाणीकरण निगम में अहम जिम्मेदारी सौंपने के साथ ही सात अन्य को अलग-अलग आयोग में सदस्य बना दिया गया। इसके बाद भाजपा ने अपने सिंबल पर उन्हें घोसी से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया मगर वह सुभासपा के सिंबल पर चुनाव लड़ने के लिए अड़ गए।
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