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समय के साथ बदल गए चुनाव के सिद्धांत
Updated Fri, 10 Nov 2017 01:54 AM IST
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राजातालाब/रामनगर। पहले जनता का अपने जनप्रतिनिधियों पर भरोसा होता था। वे उन पर विश्वास करते थे और जनप्रतिनिधि उनके बीच का होता था। चुनाव में ईमानदार और सच बोलने वालों को तवज्जो मिलती थी लेकिन अब बहुत बदलाव आ गया है। समय से साथ चुनाव के तौर-तरीके भी बदल गए। जनप्रतिनिधियोें के कार्य और व्यवहार में बदलाव होता चला गया। यह कहना है नगर पालिका रामनगर और नगर पंचायत गंगापुर के पूर्व पदाधिकारियों का।
डेढ़ दशक पूर्व गंगापुर में चेयरमैन रहे छोटेलाल मोदनवाल का कहना है कि पहले चुनाव में बड़ी शांति होती थी। इतना हौवा नहीं होता था लेकिन अब चुनाव का पूरा तरीका ही बदल गया है। गंगापुर नगर पंचायत के ही उपाध्यक्ष रहे विनय शंकर गुप्ता कहते हैं कि तब तब जोड़-तोड़ की ऐसी राजनीति नहीं थी। 22 नवंबर 1988 को वह बिना पैसा खर्च किए नगर पंचायत के उपाध्यक्ष चुने गए थे। यह चयन सभासदों ने आपसी सहमति से किया था। अब तो सदस्यों को तोड़ने के लिए धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल हो रहा है। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। 24 साल में पहली बार सभासद बना था। लोगों से वोट मांगने के लिए दरवाजे दरवाजे जाता था और उनसे अपनी बात कहता था। तब भी बैनर पोस्टर होते थे तब उसे पुलिस प्रशासन हटाती नहीं थी। न तो शराब बांटने का प्रचलन था और ना ही अधिक पैसा खर्च करने का। चुनाव लड़ना बिल्कुल आसान लगता था।
इसी तरह 1995 में रामनगर पालिका की अध्यक्ष बनीं आशा गुप्ता कहती हैं कि राजनीति में महत्वाकांक्षा बढ़ी और बिखराव आता चला गया। छोटे चुनाव में भी शीर्षस्थ लोगों की रुचि बढ़ गई है। पहले लोग जिसके साथ रहते थे, उसे निभाते थे। अब तो शामिल किसी के जुलूस में होंगे और वोट किसी को देंगे। जैसे नेता बदले वैसे ही जनता बदलने लगी। जनप्रतिनिधि जनता का दिल नहीं जीत पा रहे हैं। पहले नेता को बहुत लालच नहीं होती थी। अब तो चुनाव में धन से लेकर शराब, मुर्गा सब कुछ धड़ल्ले से चलता है।
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डेढ़ दशक पूर्व गंगापुर में चेयरमैन रहे छोटेलाल मोदनवाल का कहना है कि पहले चुनाव में बड़ी शांति होती थी। इतना हौवा नहीं होता था लेकिन अब चुनाव का पूरा तरीका ही बदल गया है। गंगापुर नगर पंचायत के ही उपाध्यक्ष रहे विनय शंकर गुप्ता कहते हैं कि तब तब जोड़-तोड़ की ऐसी राजनीति नहीं थी। 22 नवंबर 1988 को वह बिना पैसा खर्च किए नगर पंचायत के उपाध्यक्ष चुने गए थे। यह चयन सभासदों ने आपसी सहमति से किया था। अब तो सदस्यों को तोड़ने के लिए धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल हो रहा है। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। 24 साल में पहली बार सभासद बना था। लोगों से वोट मांगने के लिए दरवाजे दरवाजे जाता था और उनसे अपनी बात कहता था। तब भी बैनर पोस्टर होते थे तब उसे पुलिस प्रशासन हटाती नहीं थी। न तो शराब बांटने का प्रचलन था और ना ही अधिक पैसा खर्च करने का। चुनाव लड़ना बिल्कुल आसान लगता था।
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इसी तरह 1995 में रामनगर पालिका की अध्यक्ष बनीं आशा गुप्ता कहती हैं कि राजनीति में महत्वाकांक्षा बढ़ी और बिखराव आता चला गया। छोटे चुनाव में भी शीर्षस्थ लोगों की रुचि बढ़ गई है। पहले लोग जिसके साथ रहते थे, उसे निभाते थे। अब तो शामिल किसी के जुलूस में होंगे और वोट किसी को देंगे। जैसे नेता बदले वैसे ही जनता बदलने लगी। जनप्रतिनिधि जनता का दिल नहीं जीत पा रहे हैं। पहले नेता को बहुत लालच नहीं होती थी। अब तो चुनाव में धन से लेकर शराब, मुर्गा सब कुछ धड़ल्ले से चलता है।
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