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अविश्वास प्रस्ताव से अध्यक्ष बदलने का सिलसिला पुराना
Updated Thu, 22 Jun 2017 02:07 AM IST
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वाराणसी। जब-जब सरकार बदलती है, जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी खतरे में पड़ जाती है। शुरूआत किसी एक जिले से होती है और फिर पूरे प्रदेश में इसकी बयार चलने लगती है। वाराणसी में यह सिलसिला 1994 से चल रहा है।
1994 में तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैयालाल गुप्ता के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर भाजपा नेता उदयनाथ सिंह उर्फ चुलबुल सिंह ने अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाया था। इसके बाद हुए चुनाव में संकठा प्रसाद और फिर इसके बाद चुलबुल सिंह की बहू एवं वर्तमान में सैयदराजा से विधायक सुशील सिंह की पत्नी किरण सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष बनी थीं। इसके बाद हुए चुनाव में सुचिता पटेल को अध्यक्ष चुना गया। इनके खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। मामला हाईकोर्ट तक गया लेकिन कुर्सी नहीं बची। इनके बाद अनिल पटेल पंचायत अध्यक्ष बने। अनिल के बाद बसपा सरकार में मधुकर मौर्या पंचायत अध्यक्ष बने। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर चुलबुल सिंह के पुत्र सुजीत सिंह उर्फ डॉक्टर जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद सपा सरकार के कार्यकाल में हुए चुनाव में सपा की अपराजिता सोनकर को अध्यक्ष चुना गया।
अपराजिता के भाजपा में आने की थी चर्चा
अपराजिता सोनकर के भाजपा में आने की चर्चा करीब दो महीने से चल रही थी। दरअसल,अपराजिता को पंचायत अध्यक्ष बनाने वाले उनके मामा कैलाशनाथ सोनकर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से अजगरा से विधायक चुने गए हैं। इस पार्टी का भाजपा से विधानसभा चुनाव से पूर्व ही गठबंधन हुआ था। चर्चा रही कि कैलाश अपनी भांजी को भाजपा ज्वाइन कराकर कुर्सी बचा ले जाएंगे लेकिन यह समीकरण अभी तक फिट नहीं बैठ पाया है। बदले हुए माहौल में इस बारे में बातचीत आगे बढ़ सकती है।
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इन सदस्यों की कराई गई परेड
आशा, गायत्री देवी, रीता देवी, पप्पू पटेल, भारतेश्वर, सुनीता, रमेश पटेल, जगदीश, ज्योति सिंह, राजकुमार पटेल, अखिलेश कुमार सिंह, अमित कुमार सोनकर, रितु सिंह, जितेंद्र कुमार, रमेश कुमार, कैलाशनाथ, उषा देवी, सविता, पार्वती, ओमप्रकाश सिंह, कुंवर बिरेंद्र कुमार, विकास, सुरेंद्र पटेल और पांच अन्य।
मामले में जिला पंचायत अध्यक्ष अपराजिता सोनकर का कहना है कि पिछले दो साल में जितना काम हुआ है, उतना काम पूर्व के पांच सालों में नहीं हुआ। जिला पंचायत के कार्यों में पूरी तत्परता और पारदर्शिता बरती गई। जनहित से जुड़े हर प्रस्ताव को महत्व दिया गया और सभी जिला पंचायत सदस्यों के क्षेत्रों में काम कराया गया। कुछ सदस्यों को डरा धमका कर डीएम के सामने ले जाया गया है। अगर उनके साथ इस तरह अन्याय किया गया तो आगे कोई भी महिला राजनीति में आने की हिम्मत नहीं करेगी।
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1994 में तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैयालाल गुप्ता के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर भाजपा नेता उदयनाथ सिंह उर्फ चुलबुल सिंह ने अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाया था। इसके बाद हुए चुनाव में संकठा प्रसाद और फिर इसके बाद चुलबुल सिंह की बहू एवं वर्तमान में सैयदराजा से विधायक सुशील सिंह की पत्नी किरण सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष बनी थीं। इसके बाद हुए चुनाव में सुचिता पटेल को अध्यक्ष चुना गया। इनके खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। मामला हाईकोर्ट तक गया लेकिन कुर्सी नहीं बची। इनके बाद अनिल पटेल पंचायत अध्यक्ष बने। अनिल के बाद बसपा सरकार में मधुकर मौर्या पंचायत अध्यक्ष बने। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर चुलबुल सिंह के पुत्र सुजीत सिंह उर्फ डॉक्टर जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए। इसके बाद सपा सरकार के कार्यकाल में हुए चुनाव में सपा की अपराजिता सोनकर को अध्यक्ष चुना गया।
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अपराजिता के भाजपा में आने की थी चर्चा
अपराजिता सोनकर के भाजपा में आने की चर्चा करीब दो महीने से चल रही थी। दरअसल,अपराजिता को पंचायत अध्यक्ष बनाने वाले उनके मामा कैलाशनाथ सोनकर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से अजगरा से विधायक चुने गए हैं। इस पार्टी का भाजपा से विधानसभा चुनाव से पूर्व ही गठबंधन हुआ था। चर्चा रही कि कैलाश अपनी भांजी को भाजपा ज्वाइन कराकर कुर्सी बचा ले जाएंगे लेकिन यह समीकरण अभी तक फिट नहीं बैठ पाया है। बदले हुए माहौल में इस बारे में बातचीत आगे बढ़ सकती है।
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इन सदस्यों की कराई गई परेड
आशा, गायत्री देवी, रीता देवी, पप्पू पटेल, भारतेश्वर, सुनीता, रमेश पटेल, जगदीश, ज्योति सिंह, राजकुमार पटेल, अखिलेश कुमार सिंह, अमित कुमार सोनकर, रितु सिंह, जितेंद्र कुमार, रमेश कुमार, कैलाशनाथ, उषा देवी, सविता, पार्वती, ओमप्रकाश सिंह, कुंवर बिरेंद्र कुमार, विकास, सुरेंद्र पटेल और पांच अन्य।
मामले में जिला पंचायत अध्यक्ष अपराजिता सोनकर का कहना है कि पिछले दो साल में जितना काम हुआ है, उतना काम पूर्व के पांच सालों में नहीं हुआ। जिला पंचायत के कार्यों में पूरी तत्परता और पारदर्शिता बरती गई। जनहित से जुड़े हर प्रस्ताव को महत्व दिया गया और सभी जिला पंचायत सदस्यों के क्षेत्रों में काम कराया गया। कुछ सदस्यों को डरा धमका कर डीएम के सामने ले जाया गया है। अगर उनके साथ इस तरह अन्याय किया गया तो आगे कोई भी महिला राजनीति में आने की हिम्मत नहीं करेगी।