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राष्ट्रीय मूल्यों का संवाहक ही भारतीय साहित्य - आशुतोष भटनागर
Updated Thu, 22 Nov 2018 02:12 AM IST
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वाराणसी। राजकीय महिला महाविद्यालय, डीएलडब्ल्यू में चल रही ‘भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के स्वर’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी बुधवार को संपन्न हो गई। केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान लखनऊ और राजकीय महिला महाविद्यालय के संयुक्त संयोजन में संगोष्ठी के दूसरे दिन तक 106 शोध पत्र पढ़े गए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति वी कुटुंब शास्त्री ने किया। मुख्य अतिथि निदेशक जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर नई दिल्ली आशुतोष भटनागर ने बताया कि साहित्य में राष्ट्रीय चेतना नहीं है तो उसे भारतीय कैसे कहा जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत में लिखा गया साहित्य और भारतीय साहित्य में अंतर करने की जरूरत है। भारतीय साहित्य वहीं है जो भारतीय मूल्यों का संवाहक है। साहित्यकार डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि राजनीतिक रूप से जब हम गुलाम थे तब भाषा की आत्मा मुक्त थी। विमर्श की दिशा ही बदल गई है। स्वतंत्रता के बाद से ही राष्ट्रीय संस्कृति की स्थापना के लिए कलम नहीं चली। संगोष्ठी के दौरान सिंधी, पंजाबी, नेपाली, बंगाली, तमिल भाषाओं में शोध पत्र प्रस्तुत किए। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, मध्य प्रदेश, राजस्थान से आए प्रबुद्धजनों ने संगोष्ठी में शिरकत की। संस्कृत विभाग की ओर से डॉ. रचना शर्मा ने आयोजन किया। प्राचार्य डॉ. सुधा पांडेय, डॉ. सोनी स्वरूप, डॉ. शांति स्वरूप सिन्हा, डॉ. आर गणेशन, डॉ. राम प्रकाश आदि मौजूद रहे।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति वी कुटुंब शास्त्री ने किया। मुख्य अतिथि निदेशक जम्मू कश्मीर स्टडी सेंटर नई दिल्ली आशुतोष भटनागर ने बताया कि साहित्य में राष्ट्रीय चेतना नहीं है तो उसे भारतीय कैसे कहा जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत में लिखा गया साहित्य और भारतीय साहित्य में अंतर करने की जरूरत है। भारतीय साहित्य वहीं है जो भारतीय मूल्यों का संवाहक है। साहित्यकार डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि राजनीतिक रूप से जब हम गुलाम थे तब भाषा की आत्मा मुक्त थी। विमर्श की दिशा ही बदल गई है। स्वतंत्रता के बाद से ही राष्ट्रीय संस्कृति की स्थापना के लिए कलम नहीं चली। संगोष्ठी के दौरान सिंधी, पंजाबी, नेपाली, बंगाली, तमिल भाषाओं में शोध पत्र प्रस्तुत किए। दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, मध्य प्रदेश, राजस्थान से आए प्रबुद्धजनों ने संगोष्ठी में शिरकत की। संस्कृत विभाग की ओर से डॉ. रचना शर्मा ने आयोजन किया। प्राचार्य डॉ. सुधा पांडेय, डॉ. सोनी स्वरूप, डॉ. शांति स्वरूप सिन्हा, डॉ. आर गणेशन, डॉ. राम प्रकाश आदि मौजूद रहे।
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