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मुफ्त की मिट्टी, करोड़ों का खेल
Updated Thu, 21 Dec 2017 02:37 AM IST
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वाराणसी। आपको आश्चर्य होगा यह जानकर कि वरुणा नदी के चैनलाइजेशन के लिए जिस 21 करोड़ रुपये मिट्टी के भुगतान का पेच फंसा है, दरअसल उसके लिए एक रुपये भी खर्च नहीं होने थे। वरुणा कॉरिडोर योजना में स्पष्ट प्रावधान था कि नदी की ड्रेजिंग से जो मिट्टी निकलेगी, उसका इस्तेमाल इसके चैनलाइजेशन के लिए दोनों किनारों को दुरुस्त करने में किया जाएगा। बावजूद इसके, खुलेआम इसकी अनदेखी की गई और जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे रहे। इन सबके पीछे बड़ी वजह रही तत्कालीन जिम्मेदारों की जैसे-तैसे काम कराकर बजट खपाने की जल्दबाजी।
विभागीय सूत्रों के मुताबिक ग्रीन बेल्ट खाली कराकर पहले सीवेज रोका गया होता और फिर नदी की ड्रेजिंग शुरू कराई गई होती तो बाहर से मिट्टी मंगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। वरुणा के संरक्षण के साथ ही यह कॉरिडोर एक आदर्श कॉरिडोर के रूप में जाना जाता। लेकिन, सबसे बड़ी अड़चन नदी किनारे तलहटी तक कराए गए अवैध निर्माणों को हटाने की थी। दूसरी मुश्किल, नालों से गिरते सीवेज को रोकने की थी। इंटरसेप्टर पाइप लाइन बिछाने और चौकाघाट पंपिंग स्टेशन से जोड़कर उसे एसटीपी तक पहुंचाने का काम बहुत तेजी से कराया जाता तो भी साल भर का समय लग जाता। इसके बाद चुनाव होने थे। ऐसी स्थिति में बजट खपाने की जल्दबाजी और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई न करने के होटल कारोबारियों के दबाव के चलते पूर्ववर्ती सरकार में जनप्रतिनिधियों और कॉरिडोर से जुड़े अफसरों ने बीच का रास्ता निकाला। कॉरिडोर के नाम पर सबसे पहले ड्रेजिंग ही शुरू करा दी। एक तरफ ड्रेजिंग के नाम पर मनमाना रकम खपाई गई, दूसरी तरफ नालों से सीवेज और गाद भरने से स्थिति जस की तस होती गई। ऐसे में चैनलाइजेशन के लिए मिट्टी बाहर से मंगाने की योजना बनाई गई। तर्क दिखाया गया कि चैनलाइजेशन के लिए बाहर से मंगाई जाने वाली मिट्टी ही मुफीद है। जबकि, सूत्रों की मानें तो वरुणा किनारे भी जगह-जगह भारी मात्रा में मिट्टी का टीला जमा है। ड्रेजिंग की मिट्टी उपयुक्त नहीं होने पर इसका इस्तेमाल बेहद कम लागत में किया जा सकता था लेकिन, तत्कालीन कर्ता-धर्ताओं ने औसतन पांच हजार रुपये डंपर के हिसाब से मिट्टी की फाइल तैयार कर दी। अब जब इसके भुगतान पर पेच फंसने के बाद मुख्य अभियंता समेत तीन पर कार्रवाई हो चुकी है तो जिम्मेदार अपनी-अपनी सफाई देने में जुट गए हैं। सिंचाई विभाग के अधिकारियों की मानें तो यूपीपीसीएल ने मिट्टी बाहर से लाने के लिए फाइल तैयार की थी जबकि यूपीपीसीएल के अधिकारी इससे पल्ला झाड़ रहे हैं। उनका कहना है कि कॉरिडोर के लिए जो पैसा मिला था, उससे क्या काम कराया जाना है, इस बारे में सिंचाई विभाग के अधिकारी कोई जानकारी नहीं दे रहे थे। इसकी शिकायत उन्होंने सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह और प्रमुख सचिव सिंचाई सुरेश चंद्रा से की थी।
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विभागीय सूत्रों के मुताबिक ग्रीन बेल्ट खाली कराकर पहले सीवेज रोका गया होता और फिर नदी की ड्रेजिंग शुरू कराई गई होती तो बाहर से मिट्टी मंगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। वरुणा के संरक्षण के साथ ही यह कॉरिडोर एक आदर्श कॉरिडोर के रूप में जाना जाता। लेकिन, सबसे बड़ी अड़चन नदी किनारे तलहटी तक कराए गए अवैध निर्माणों को हटाने की थी। दूसरी मुश्किल, नालों से गिरते सीवेज को रोकने की थी। इंटरसेप्टर पाइप लाइन बिछाने और चौकाघाट पंपिंग स्टेशन से जोड़कर उसे एसटीपी तक पहुंचाने का काम बहुत तेजी से कराया जाता तो भी साल भर का समय लग जाता। इसके बाद चुनाव होने थे। ऐसी स्थिति में बजट खपाने की जल्दबाजी और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई न करने के होटल कारोबारियों के दबाव के चलते पूर्ववर्ती सरकार में जनप्रतिनिधियों और कॉरिडोर से जुड़े अफसरों ने बीच का रास्ता निकाला। कॉरिडोर के नाम पर सबसे पहले ड्रेजिंग ही शुरू करा दी। एक तरफ ड्रेजिंग के नाम पर मनमाना रकम खपाई गई, दूसरी तरफ नालों से सीवेज और गाद भरने से स्थिति जस की तस होती गई। ऐसे में चैनलाइजेशन के लिए मिट्टी बाहर से मंगाने की योजना बनाई गई। तर्क दिखाया गया कि चैनलाइजेशन के लिए बाहर से मंगाई जाने वाली मिट्टी ही मुफीद है। जबकि, सूत्रों की मानें तो वरुणा किनारे भी जगह-जगह भारी मात्रा में मिट्टी का टीला जमा है। ड्रेजिंग की मिट्टी उपयुक्त नहीं होने पर इसका इस्तेमाल बेहद कम लागत में किया जा सकता था लेकिन, तत्कालीन कर्ता-धर्ताओं ने औसतन पांच हजार रुपये डंपर के हिसाब से मिट्टी की फाइल तैयार कर दी। अब जब इसके भुगतान पर पेच फंसने के बाद मुख्य अभियंता समेत तीन पर कार्रवाई हो चुकी है तो जिम्मेदार अपनी-अपनी सफाई देने में जुट गए हैं। सिंचाई विभाग के अधिकारियों की मानें तो यूपीपीसीएल ने मिट्टी बाहर से लाने के लिए फाइल तैयार की थी जबकि यूपीपीसीएल के अधिकारी इससे पल्ला झाड़ रहे हैं। उनका कहना है कि कॉरिडोर के लिए जो पैसा मिला था, उससे क्या काम कराया जाना है, इस बारे में सिंचाई विभाग के अधिकारी कोई जानकारी नहीं दे रहे थे। इसकी शिकायत उन्होंने सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह और प्रमुख सचिव सिंचाई सुरेश चंद्रा से की थी।
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