{"_id":"596e6bc44f1c1b382f8b4671","slug":"111500408772-varanasi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"गंगा निर्मलीकरण की राह में बाधाओं की बाढ़","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गंगा निर्मलीकरण की राह में बाधाओं की बाढ़
Updated Wed, 19 Jul 2017 01:50 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वाराणसी। काशी से प्रयाग के बीच गंगा को निर्मल बनाने की राह में कदम-कदम पर चुनौतियां खड़ी हैं। तटीय शहरों का अनियोजित विकास जहां सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है, वहीं अंडरसाइज सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी चिंता की बड़ी वजह हैं। बारिश के दिनों में गंगा किनारे बने सीवेज पंपिंग स्टेशन से लाखों लीटर सीवेज सीधे गंगा में बहा दिया जाता है। जब तक इन समस्याओं का बुनियादी समाधान नहीं निकाला जाएगा, तब तक इलाहाबाद से बिहार तक गंगा निर्मलीकरण का सपना साकार होना टेढ़ी खीर साबित होगा।
एनजीटी के निर्देश पर 24 जुलाई को गंगा निर्मलीकरण के लिए सेकेंड फेज के एजेंडे पर मंथन होगा। इलाहाबाद से बनारस और पटना तक गंगा निर्मलीकरण की द्वितीय चरण की योजना पर काम शुरू करने के लिए जहां कार्ययोजना तैयार की जा रही है, वहीं इस राह में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। विख्यात नदी पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. यूके चौधरी कहते हैं कि इलाहाबाद से पटना के बीच के शहरों में टाउन प्लानिंग का अभाव है। अवैध कालोनियों की भरमार है। गंगा किनारे जो बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है, वहां फ्लड जोन में इन कॉलोनियों के चलते अवजल निकासी की राह में बड़ा अवरोध है। अकेले बनारस में 500 से अधिक अवैध कॉलोनियां चिह्नित की गई हैं। इन कॉलोनियों के घरेलू सीवेज का डिस्चार्ज कहां हो रहा है। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इसके अलावा काशी में डंपिंग ग्राउंड न होने से शहर का कूड़ा बड़ी मात्रा में रामनगर, राजघाट के अलावा अन्य जगहों पर गंगा किनारे ही गिराया जा रहा है। पर्यावरणविद रमेश चोपड़ा का कहना है कि जितने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने हैं वह अंडर साइज हैं। सीवेज शोधन में सक्षम नहीं हैं। इसके अलावा घरेलू और औद्योगिक डिस्चार्ज की मॉनीटरिंग भी नहीं होती। इसका सटीक आंकड़ा भी अभी तक नहीं है कि कितना डिस्चार्ज हो रहा है और वह जाता कहां है। जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं किया जाएगा तब तक गंगा निर्मलीकरण की योजना सिरे नहीं चढ़ सकती।
विज्ञापन
एनजीटी के निर्देश पर 24 जुलाई को गंगा निर्मलीकरण के लिए सेकेंड फेज के एजेंडे पर मंथन होगा। इलाहाबाद से बनारस और पटना तक गंगा निर्मलीकरण की द्वितीय चरण की योजना पर काम शुरू करने के लिए जहां कार्ययोजना तैयार की जा रही है, वहीं इस राह में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। विख्यात नदी पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. यूके चौधरी कहते हैं कि इलाहाबाद से पटना के बीच के शहरों में टाउन प्लानिंग का अभाव है। अवैध कालोनियों की भरमार है। गंगा किनारे जो बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है, वहां फ्लड जोन में इन कॉलोनियों के चलते अवजल निकासी की राह में बड़ा अवरोध है। अकेले बनारस में 500 से अधिक अवैध कॉलोनियां चिह्नित की गई हैं। इन कॉलोनियों के घरेलू सीवेज का डिस्चार्ज कहां हो रहा है। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इसके अलावा काशी में डंपिंग ग्राउंड न होने से शहर का कूड़ा बड़ी मात्रा में रामनगर, राजघाट के अलावा अन्य जगहों पर गंगा किनारे ही गिराया जा रहा है। पर्यावरणविद रमेश चोपड़ा का कहना है कि जितने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने हैं वह अंडर साइज हैं। सीवेज शोधन में सक्षम नहीं हैं। इसके अलावा घरेलू और औद्योगिक डिस्चार्ज की मॉनीटरिंग भी नहीं होती। इसका सटीक आंकड़ा भी अभी तक नहीं है कि कितना डिस्चार्ज हो रहा है और वह जाता कहां है। जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं किया जाएगा तब तक गंगा निर्मलीकरण की योजना सिरे नहीं चढ़ सकती।
विज्ञापन