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‘यूपी पुलिस’ ही तो कुंडा कांड की साजिश में साझेदार नहीं

Mon, 11 Mar 2013 12:25 PM IST
लखनऊ/अमर उजाला ब्यूरो
लखनऊ/अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 11 Mar 2013 12:25 PM IST
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'UP police "not only partners in the kunda kand
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिए जिम्मेदार आला अफसर इस तथ्य से हफ्ते भर बाद भी अनजान बने हुए हैं कि उनकी फोर्स का होनहार सीओ किसी ऐसे मामले में की जांच में आगे बढ़ रहा था, जो उसकी जिन्दगी के लिए खतरा बन गई। ये वही अधिकारी हैं जिन्हें घटना वाले दिन दो मार्च को यह घंटों पता नहीं था कि उनके विभाग के युवा अफसर को सरेराह मारकर लाश सड़क के खड़ंजें पर छोड़ दी गई है।
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पुलिस के पूर्व महानिदेशकों का कहना है कि किसी भी घटना के बाद उसकी जांच-पड़ताल के  शुरुआती चार-पांच दिन बेहद अहम माने जाते हैं। मगर कुंडा में तिहरे हत्याकांड की सीबीआई को जांच जाने से पहले पांच दिनों में यूपी पुलिस ने चश्मदीदों की पहचान, सुरक्षा, मौका-ए-वारदात की हालत देखकर क्या आकलन किया, यह भी शायद ही पता हो। ऐसा लगा कि वह सिर्फ यह इंतजार करती रही कि सरकार वारदात की जांच सीबीआई को सौंपने की घोषणा कब करती है।
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तथ्यों पर नजर डालें तो इस घटना के बाद पुलिस के शीर्ष अधिकारियों का ध्यान इस बात पर जाना चाहिए था कि कहीं वही लोग तो इसके पीछे नही हैं, जिन्हें जियाउल हक की वहां पोस्टिंग रास नहीं आ रही थी। रिटायर्ड पुलिस अफसरों की मानें तो हिस्ट्रीशीट भेजने का मतलब ही यह था कि सीओ कोई जांच कर रहे थे।
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पर, यूपी जैसे बड़े राज्य की पुलिस और उसके आला अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। अब कह रहे हैं कि उन्हें नहीं पता कि सीओ किसकी जांच कर रहे थे। वे न तो शहीद अफसर की सर्विस रिवॉल्वर का पता लगा सके, न हैंडी कैमरे और मोबाइल फोन का। वह सीओ को लगी गोली का पता भी नहीं लगा पाई। यहां तक कि घटना की पड़ताल में खास कड़ी प्रधान नन्हे यादव के भाई कहां गए, इसका पता भी पुलिस अफसर नहीं लगा पाए।

पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता कहते हैं, ‘किसी भी घटना के बाद स्थानीय पुलिस की भूमिका अहम होती है। सीबीआई जांच के इंतजार में उसे हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठना चाहिए। जब जिस एजेंसी को जांच करनी होगी, वह करेगी। पर, पुलिस को तो अपनी जिम्मेदारी निभानी ही चाहिए। वजह, सीबीआई जांच को अस्वीकार भी कर सकती है। जांच करेगी तो भी से स्थानीय पुलिस की मदद अपरिहार्य होती है। ऐसी स्थिति में शुरुआती दिनों की जांच बहुत मायने रखती है।

पूर्व डीजीपी के अनुसार, चश्मदीद तलाशने, साक्ष्य बचाने और घटना की तह तक पहुंचने के लिए शुरुआती चार-पांच दिन बहुत अहम होते हैं। शातिर अपराधी इस मौके पर पुलिस की सुस्ती का फायदा उठाकर साक्ष्य मिटाने की कोशिश करते हैं।’ पूर्व डीजीपी की बातों पर इस मामले में पुलिस अफसरों की भूमिका को कसें तो लापरवाही पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। पूर्व डीजीपी कहते हैं कि शुरुआती चार-पांच दिन जो दिन किसी भी घटना की जांच व सच्चाई पता लगाने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

पर, यहां पुलिस के छोटे अधिकारी ही नहीं बल्कि बड़े अधिकारी भी लापरवाही से बैठे रहे। इस इंतजार में कि सीबीआई आएगी तो अपना काम करेगी। एक पहलू और ध्यान देने वाला है। सूबे की सियासत में जब एक जांबाज अफसर की मर्डर मिस्ट्री सड़क से सदन तक चर्चा का बहस बनी हुई थी तो अपनी पुलिस इस घटना के चश्मदीद और अपने सेनापति (सीओ) को भीड़ के बीच में मरने के लिए छोड़कर भागने वाले थानेदार को बचाने के कुतर्क देती दिख रही थी। वह भी उस थानेदार के लिए जिसने जितनी फुर्ती सीओ को छोड़कर भागने में दिखाई थी, उतनी ही तेजी थाने में एफआईआर दर्ज कराने में भी दिखाई। मीडिया में खुलासे के बाद उसके खिलाफ कार्रवाई हुई। स्थानीय पुलिस की लापरवाही तो कुछ हद तक समझ में आ भी सकती है लेकिन उच्च पदों पर बैठे अफसर ऐसे भगोड़े पर कार्रवाई को लेकर किस दबाव में काम कर रहे थे।

नाम न छापने के  आग्रह के साथ एक अन्य पूर्व डीजीपी कहते हैं कि  ईमानदारी की बात यह है कि  स्थानीय अफसरों पर ऐसे मामलों में ‘मानसिक दबाव’ होता है। लोग सोच में पड़ जाते हैं कि क्या करें-क्या न करें। जितना बड़ा मामला, उतना बड़ा मानसिक दबाव। जो मानसिक दबाव से पार पा लेता है वह ईमानदारी से काम करता है और जो दबाव में आ जाता है उसके बारे में क्या कहना? मगर इस दबाव को समझना पड़ेगा।

वह उल्टा सवाल करते हैं कि  एक पूर्ण बहुमत की सरकार को एक निर्दल विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल करने की कौनसी मजबूरी थी? दूसरा, उसे उसी विभाग का मंत्री क्यों बनाया गया जिसमें वह वर्षों तक कैद रहा? कहते हैं कि जब स्थानीय मुलाजिम को पता है कि उसका खूंटा किसके साथ रहने से मजबूत है तो वह मनमानी करेगा ही। आज ईमानदार अफसरों की तभी पूछ होती है जब कोई बड़ी घटना हो या चुनाव का मौका। बाकी समय वे उपेक्षित पड़े रहते हैं। जब फील्ड में जुगाड़ से पहुंचने वाले लोग होंगे तो ऐसे हालात पैदा होना स्वाभाविक है।

पूर्व डीजीपी श्रीराम अरुण कहते हैं कि ऊपर से ही संदेश साफ होना चाहिए कि उसकी मंशा क्या है। तभी परिणाम ठीक रहेगा। पूर्व डीजीपी गुप्ता कहते हैं कि कुंडा की घटना का संदेश साफ है कि पुलिस में अनुशासन घट रहा है। अपने सीनियर अफसर को छोड़कर भागना बेहद चिंताजनक है। भ्रष्टाचार, लोकल लोगों का भय और जवाबदेही में कमी पर ध्यान देने की जरूरत है।


‘‘जबसे पुलिस का राजनीतिकरण बढ़ा है, पुलिस की निष्ठा वर्दी और विभाग की जगह सत्ताधारी दल के साथ हो गई है। पुलिस में अनुशासन खत्म हो गया है। यही वह वजह है जिसकी वजह से इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं।’’
                - प्रकाश सिंह, पूर्व पुलिस महानिदेशक, यूपी
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