{"_id":"6ad07d9b974b68369f09c266","slug":"up-elections-kurmi-and-pasi-communities-in-focus-as-bjp-and-samajwadi-party-vie-for-their-support-2026-10-15","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"यूपी: जंग के केंद्र में कुर्मी-पासी, हर दल से बरसेंगे टिकट, सपा के लिए बड़ा मौका; भाजपा के सामने है ये चुनौती","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूपी: जंग के केंद्र में कुर्मी-पासी, हर दल से बरसेंगे टिकट, सपा के लिए बड़ा मौका; भाजपा के सामने है ये चुनौती
Thu, 15 Oct 2026 01:21 PM IST
Sharukh Khan
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
Published by: Sharukh Khan
Updated Thu, 15 Oct 2026 01:21 PM IST
सार
यूपी विधानसभा चुनाव में कुर्मी और पासी जंग के केंद्र में होंगे। हर दल से टिकट बरसेंगे। दोनों ही दल टिकट लो और वोट दो का फार्मूला अपनाएंगे। भाजपा ने साधे रखने की तो सपा ने सेंध लगाने की रणनीति बनाई है।
विज्ञापन
UP Elections
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कुर्मी और पासी बिरादरी के पौ बारह होंगे। जीत की हैट्रिक के लिए भाजपा की रणनीति हर हाल में दोनों बिरादरी को अपने साथ बांधे रखने की है, जबकि सपा की रणनीति भाजपा के इस अहम वोट बैंक में सेंध लगा कर जीत का सूखा खत्म करने की है। अपनी रणनीति को अमली जामा पहनाने केलिए दोनों ही दलों ने इन दो बिरादरियों पर टिकटों की बरसात करने के साफ संकेत दिए हैं।
दरअसल दोनों ही दल के रणनीतिकार मान रहे हैं कि इस बार चुनाव के जनादेश की चाबी इन्हीं दो बिरादियों के पास होगी। आठ फीसदी आबादी वाली ओबीसी की दूसरी सबसे बड़ी कुर्मी बिरादरी राज्य की चार दर्जन सीटों पर हार-जीत में निर्णायक भूमिका बनाती है, जबकि इतनी ही सीटों पर इसमें जनादेश को दिशा देने की क्षमता है। दूसरी ओर करीब 4 फीसदी वाली दलितों की दूसरी सबसे बड़ी पासी बिरादरी भी 60 सीटों पर हार-जीत में अहम भूमिका निभाती है।
विज्ञापन
दरअसल दोनों ही दल के रणनीतिकार मान रहे हैं कि इस बार चुनाव के जनादेश की चाबी इन्हीं दो बिरादियों के पास होगी। आठ फीसदी आबादी वाली ओबीसी की दूसरी सबसे बड़ी कुर्मी बिरादरी राज्य की चार दर्जन सीटों पर हार-जीत में निर्णायक भूमिका बनाती है, जबकि इतनी ही सीटों पर इसमें जनादेश को दिशा देने की क्षमता है। दूसरी ओर करीब 4 फीसदी वाली दलितों की दूसरी सबसे बड़ी पासी बिरादरी भी 60 सीटों पर हार-जीत में अहम भूमिका निभाती है।
विज्ञापन
Trending Videos
सपा के पास बड़ा मौका
सपा की रणनीति इस बार नई योजना और नई सोशल इंजीनियरिंग के साथ मैदान में उतरने की है। मसलन सपा गठबंधन इस बार मुस्लिम-यादव बिरादरी को अधिकतम 80 टिकट देगा। शेष 323 टिकट गैरयादव ओबीसी-गैर जाटव दलितों में बांटेगा। इनमें भी पार्टी की योजना कुर्मी को पहली, पासी को दूसरी प्राथमिकता देने की है।
सपा की रणनीति इस बार नई योजना और नई सोशल इंजीनियरिंग के साथ मैदान में उतरने की है। मसलन सपा गठबंधन इस बार मुस्लिम-यादव बिरादरी को अधिकतम 80 टिकट देगा। शेष 323 टिकट गैरयादव ओबीसी-गैर जाटव दलितों में बांटेगा। इनमें भी पार्टी की योजना कुर्मी को पहली, पासी को दूसरी प्राथमिकता देने की है।
विज्ञापन
इसके अलावा पार्टी ने पाल, गुर्जर, सैनी सहित दूसरी दलित बिरादरी को टिकट के जरिए साधने की योजना बनाई है। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ये जातियां भाजपा के पाले में चली गई है। हालांकि 2024 के चुनाव में इन जातियों को साधने के लिए टिकट बांटने का सपा का फार्मूला सफल रहा था।
भाजपा की चुनौती बड़ी
पार्टी 2014 से राज्य में 60 फीसदी (अगड़ा, गैरयादव ओबीसी, गैरजाटव दलित) पर दांव लगाती रही है। बीते लोकसभा चुनाव में सपा ने पार्टी के अगड़ा को छोड़ कर अन्य वोट बैंक में सेंध लगाने में सफलता हासिल की।
पार्टी 2014 से राज्य में 60 फीसदी (अगड़ा, गैरयादव ओबीसी, गैरजाटव दलित) पर दांव लगाती रही है। बीते लोकसभा चुनाव में सपा ने पार्टी के अगड़ा को छोड़ कर अन्य वोट बैंक में सेंध लगाने में सफलता हासिल की।
पार्टी के वरिष्ठï रणनीतिकार के मुताबिक 40 फीसदी (जाटव, यादव, मुस्लिम) वोट बैंक पार्टी के खिलाफ एकतरफा एकजुट होता है। ऐसे में अगर पासी-कुर्मी का बहुमत वोट पार्टी को नहीं मिला तो मुश्किलें बढ़ेगी। यही कारण है कि भाजपा ने भी 300 के आसपास टिकट गैरयादव ओबीसी, गैरजाटव दलित में बांटने की योजना बनाई है।
आबादी कम मगर प्रभाव ज्यादा
भाजपा की गैरयादव ओबीसी-गैरजाटव दलित की नई सोशल इंजीनियरिंग के कारण राज्य की सियासत में यादव और मुस्लिम से कम आबादी के बावजूद कुर्मी और पासी की धमक बढ़ी। मसलन 2017 के चुनाव में 17 यादव की तुलना में 34 कुर्मी विधायक जीते।
भाजपा की गैरयादव ओबीसी-गैरजाटव दलित की नई सोशल इंजीनियरिंग के कारण राज्य की सियासत में यादव और मुस्लिम से कम आबादी के बावजूद कुर्मी और पासी की धमक बढ़ी। मसलन 2017 के चुनाव में 17 यादव की तुलना में 34 कुर्मी विधायक जीते।
महज 4 फीसदी की आबादी वाली पासी बिरादरी के 15 तो 19 फीसदी आबादी वाले मुस्लिम बिरादरी के महज 24 विधायक बने। 2022 के चुनाव में 25 यादव की तुलना में 40 कुर्मी व 25 पासी विधायक चुने गए।
बिरादरी का बदला पैटर्न
दरअसल गैरयादव ओबीसी और गैरजाटव दलितों में हाल के कुछ वर्षों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ी है। इसके कारण इन जातियों के वोटिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इनमें शामिल जातियों ने पार्टी की जगह अपने जाति के उम्मीदवारों को वरीयता दी है।
दरअसल गैरयादव ओबीसी और गैरजाटव दलितों में हाल के कुछ वर्षों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ी है। इसके कारण इन जातियों के वोटिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इनमें शामिल जातियों ने पार्टी की जगह अपने जाति के उम्मीदवारों को वरीयता दी है।
यही कारण है कि बीते लोकसभा चुनाव में सपा के 12 कुर्मी उम्मीदवारों में से 7 चुनाव जीते। इन्हें टिकट देने में पिछड़ी भाजपा ने महज 5 उम्मीदवार उतारे, जिसमें उन्हें महज तीन सीट पर ही सफलता मिली।