उत्तर प्रदेश चुनाव: पश्चिमी यूपी की जमीन पर क्या फिर भगवा झंडा लहरा पाएगी भाजपा! इस बार बहुत कुछ लगा है दांव पर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरीके से भाजपा मथुरा और कृष्ण को लेकर के राजनैतिक हवा दे रही है, उससे ध्रुवीकरण को मजबूती मिल सकती है। हालांकि इस इलाके में किसानों के गन्ने भुगतान से लेकर किसानों के बिजली के बड़े बिल आधे करने जैसे मुद्दे भी हैं, लेकिन वह भाजपा के लिए कितना मुफीद होंगे यह कह पाना अभी मुश्किल है...
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उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले चरण की नामांकन प्रक्रिया मकर संक्रांति से शुरू हो जाएगी। ये नामांकन प्रक्रिया उत्तर प्रदेश के उस पश्चिम इलाके से होगी, जिसे राजनीतिक प्रयोगशाला के तौर पर भी जाना जाता है। फिलहाल पहले चरण में होने वाले 11 जिलों के 58 विधानसभा क्षेत्रों में इस वक्त भाजपा का 90 फीसदी सीटों पर कब्जा है। इसलिए भाजपा का पहले चरण के चुनाव में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस बार किसान आंदोलन की तल्खी से चुनाव का रुख मोड़ेगा या ध्रुवीकरण से राजनैतिक सियासत की चाल को बदल देगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल राजनीतिक दलों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं को जीतने में अपना सब कुछ दांव पर लगा कर जोर आजमाइश शुरू कर दी है।
मुजफ्फरनगर के दंगों ने बदली थी हवा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से समझने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रवक्ता ओपी तोमर कहते हैं कि यह इलाका हमेशा से राजनीति की एक बड़ी प्रयोगशाला रहा है। यही वजह है कि सभी राजनीतिक पार्टियां पश्चिमी उत्तर प्रदेश में न सिर्फ जातिगत समीकरणों को साधते हुए चुनावी मैदान में उतरती हैं बल्कि तमाम राजनैतिक घटनाक्रमों के नफा-नुकसान को भी साध कर एक-एक कदम आगे बढ़ाती है। प्रोफेसर तोमर कहते हैं कि 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों ने तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पूरी हवा ही बदल दी थी। इसी का नतीजा था कि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमकर रंग बिखेरा। जबकि इससे पहले इस इलाके में बसपा न सिर्फ एक बड़ी पार्टी के तौर पर आगे रहती थी, बल्कि राजनैतिक समीकरणों को साधने में भी पार्टी का कोई मुकाबला नहीं था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। प्रोफेसर तोमर के मुताबिक इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश की यही जमीन दो लिहाज से राजनीतिक समीकरणों को बनाने और बिगाड़ने का काम करेगी। पहला मुद्दा किसान आंदोलन का है। जबकि दूसरी हवा सांप्रदायिक बंटवारे की सियासी चाल की है।
मथुरा है इस बार भाजपा का एजेंडा!
2017 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 11 जिलों मुज़फ्फरनगर, मेरठ, बागपत, शामली, हापुड़, बुलंदशहर, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, नोएडा और गाजियाबाद की 58 विधानसभाओं में 53 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। जबकि दो सीटें सपा और दो सीटें बसपा ने जीतीं और एक सीट राष्ट्रीय लोकदल के हिस्से में आई थी। लेकिन इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए बड़ी चुनौतियां सामने हैं। राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं कि इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के लिए किसानों का आंदोलन है। दूसरा समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल का गठबंधन भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर सामने आएगा। शुक्ला कहते हैं इस बार किसी भी तरीके का राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसा माहौल अभी बनता हुआ नहीं दिख रहा है। उनका कहना है ऐसे मामलों में फिलहाल भाजपा के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 53 जीती हुईं सीटों पर वापसी करने के लिए बहुत बड़ी जंग लड़नी होगी। हालांकि वह कहते हैं भाजपा के लिए इन 11 जिलों में एक जिला ऐसा भी है जो पार्टी की टोन के लिहाज से न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनके एजेंडे को सेट कर रहा है बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में उसे हवा देकर माहौल बनाया जा रहा है। वह कृष्ण की नगरी मथुरा है।
जातिगत और दलगत राजनीति से ऊपर भाजपा सरकार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरीके से भाजपा मथुरा और कृष्ण को लेकर के राजनैतिक हवा दे रही है, उससे ध्रुवीकरण को मजबूती मिल सकती है। हालांकि इस इलाके में किसानों के गन्ने भुगतान से लेकर किसानों के बिजली के बड़े बिल आधे करने जैसे मुद्दे भी हैं, लेकिन वह भाजपा के लिए कितना मुफीद होंगे यह कह पाना अभी मुश्किल है। भाजपा के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था के जो हालात पहले थे और जो आज हैं उसे देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा सरकार ने किस तरीके से काम किया है। वह कहते हैं कि भाजपा सरकार जातिगत और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सबके लिए काम करती आई है। उनका कहना है कि सपा सरकार में पश्चिमी उत्तर प्रदेश को दंगों और पलायन के लिए जाना जाता था लेकिन योगी राज के आते ही यह सब खत्म हो गया। न वहां दंगे हुए और न ही कोई पलायन हुआ बल्कि कानून का राज स्थापित हुआ। हालांकि भाजपा के इन दावों की परख 10 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनावों में होगी।
कभी इस इलाके में मजबूत थी बसपा
कभी पश्चिम उत्तर प्रदेश बसपा का गढ़ हुआ करता था। लेकिन बदलते सियासी समीकरणों के चलते पार्टी की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पकड़ कमजोर तो होती रही, लेकिन पार्टी में आस्था रखने वालों की इस इलाके में कमी नहीं हुई। यही वजह है कि 2017 के विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी इस इलाके में अपने खराब प्रदर्शन के बाद भी दो विधानसभा सीटों को जीतने में न सिर्फ सफल हुई, बल्कि 30 सीटों पर दूसरे नंबर की पार्टी भी बनी। 2017 वह साल था जब 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद यहां के हालात बदल चुके थे। दलितों और मुस्लिम बाहुल्य इस इलाके में बसपा की मजबूती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2012 के विधानसभा चुनावों में जब समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश में सरकार बनी, तब भी बसपा की सबसे ज्यादा सीटें इसी क्षेत्र से हुआ करती थीं। लेकिन इस बार होने वाले विधानसभा चुनावों में यहां की तस्वीर फिलहाल अभी बदली हुई नजर आ रही है। भाजपा, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और कांग्रेस ने तो इस इलाके में अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए रैलियां और जनसभाएं कर लीं, लेकिन बसपा के इस गढ़ में बसपा सुप्रीमो मायावती की रैली तक नहीं हो सकी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इन 11 जिलों में सपा और राष्ट्रीय लोकदल इस बार नए समीकरणों के साथ मैदान में है। 2017 के चुनावों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के रास्ते अलग थे। राजनीतिक गुणा गणित के आधार पर अगर देखें तो पिछले विधानसभा के चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल अपने इस गढ़ में महज एक सीट ही जीत पाई थी। जबकि तीन सीटों पर दूसरे नंबर पर थी। वहीं समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ पिछले विधानसभा चुनाव में एक साथ मैदान में थे। लेकिन इस बार दोनों राजनीतिक दलों की राहें अलग हो गई हैं। समाजवादी पार्टी को 2017 के विधानसभा चुनावों में यहां से दो सीटें मिली थीं, लेकिन 15 सीटों पर समाजवादी पार्टी और पांच सीटों पर सपा के सहयोगी कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी। लेकिन किसान आंदोलन की हवा में इस बार सपा और राष्ट्रीय लोकदल की ऐसी सियासी साझेदारी बनी कि दोनों दल इस बार मिलकर मैदान में है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि इस बार सपा और राष्ट्रीय लोकदल की नई साझेदारी उन्हें सत्ता दिलाएगी ताकि किसानों के साथ न्याय हो सके। उनका कहना है कि किसानों के साथ भाजपा ने जिस तरीके से अन्याय किया है उसका खामियाजा पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में भुगतना ही पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषक भी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन में जान देख रहे हैं। वह कहते हैं जिस तरीके से समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक और राष्ट्रीय लोकदल का कोर वोट बैंक अगर एक हो जाता है तो भाजपा के लिए निश्चित तौर पर बड़ी राजनीतिक चुनौती मिलने वाली है। हालांकि यह बात अलग है कि ओवैसी की पार्टी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों को एकजुट करने में लगी है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए बीते कुछ चुनावों से लगातार चुनौतियां सामने आ ही रही हैं। विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का दामन छोड़कर दूसरे दलों में अपनी जगह तलाश कर ली। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों के मुद्दों पर साथ तो दिया है, लेकिन उसका उन्हें राजनीतिक नफा नुकसान कितना होगा इसका आकलन कर पाना फिलहाल मुश्किल है। राजनीतिक विश्लेषक केएन पंत कहते हैं कि कांग्रेस को जिंदा रहने के लिए केवल किसानों के मुद्दों के भरोसे नहीं बैठना होगा। बल्कि कांग्रेस को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दमखम दिखाने के लिए वह सभी राजनैतिक गुणा भाग भी अपनाने होंगे, जो बीते कुछ समय से इस इलाके के राजनीतिक परिदृश्य में दिखते आए हैं। हालांकि प्रियंका गांधी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' जैसे अभियान से महिलाओं को न सिर्फ साधने की कोशिश की है, बल्कि पहले चरण में महिलाओं को दिए गए टिकट से भी इस बात का अंदाजा लग रहा है कि कांग्रेस महिलाओं के मुद्दों के साथ ही आगे बढ़ेगी।