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होलाष्टक आज से, 12 को जलेगी होली
अमर उजाला ब्यूरो, उन्नाव
Updated Sat, 04 Mar 2017 11:06 PM IST
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होलिका
- फोटो : अमर उजाला
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रंगो का त्योहार फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली के त्योहार के आठ दिन पहले होलाष्टक लग जाता है। इस बार पांच मार्च से होलाष्टक लग रहा है। इसे देखते हुए शहर के मुख्य चौराहों पर होलिका लगने लगी हैं। शहर के लगभग एक सैकड़ा से अधिक स्थानों पर होलिका जलाई जाती है, जिसके लिए लोगों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं।
मालूम हो कि जिस स्थान पर होलिका जलाने के लिए चुना जाता है। पहले उस जगह को शुद्ध कर लिया जाना चाहिए। यह काम होलाष्टक के दिन से शुरू होता है। इस बार होलिका दहन 12 मार्च पूर्णिमा को होगा। 13 मार्च को परेवा होने के कारण रंग खेला जाएगा। होलिका दहन के तीसरे दिन दूज मनाई जाती है। दूज 14 मार्च को पड़ रही है। मान्यता है कि होलाष्टक लगने के आठ दिन बाद पूर्णिमा के दिन होलिका जलाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन होलिका में नया अनाज अग्नि को समर्पित करने से पैदावार अच्छी होती है।
होलिका लगाने में ध्यान रखें ये बात
जानकार बताते हैं कि होलिका लगाने में हरी लकड़ियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसमें टायर, ट्यूब, कबाड़, कूड़ा, प्लास्टिक, रबर की चीजें व जूते आदि भी नहीं डालने चाहिए। इस प्रकार की वस्तुओं का इस्तेमाल करने से वातावरण दूषित होता ही है, साथ ही पूजन आदि कार्यों में यह चीजें ठीक नहीं होती हैं।
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कैसे हुई होलाष्टक की शुरुआत
आचार्य पुत्तन लाल शुक्ल की मानें तो श्रीमद्भागवत में लिखा है कि अन्न की पैदावार होने के बाद उसका भोग भगवान को लगाना चाहिए। इसलिए इस दिन गेहूं की बालियों को गन्ने में बांधकर अग्नि को समर्पित किया जाता है। इसके अलावा एक कहावत है कि भक्तराज प्रहलाद की बुआ होलिका ने उसे अपने साथ अग्नि में बैठा लिया था। होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान मिला था, लेकिन जब प्रहलाद बच गए और होलिका जल गई तो इससे प्रसन्न होकर लोगाें ने इस दिन होलिका दहन के रूप में मनाने लगे। इसके अलावा एक प्राचीन मान्यता यह भी है कि भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ लगातार आठ दिनों तक रंग खेला था और नवें दिन अपने वस्त्र अग्नि को समर्पित कर दिए थे, तभी से होली का त्योहार मनाया जाता है।
मालूम हो कि जिस स्थान पर होलिका जलाने के लिए चुना जाता है। पहले उस जगह को शुद्ध कर लिया जाना चाहिए। यह काम होलाष्टक के दिन से शुरू होता है। इस बार होलिका दहन 12 मार्च पूर्णिमा को होगा। 13 मार्च को परेवा होने के कारण रंग खेला जाएगा। होलिका दहन के तीसरे दिन दूज मनाई जाती है। दूज 14 मार्च को पड़ रही है। मान्यता है कि होलाष्टक लगने के आठ दिन बाद पूर्णिमा के दिन होलिका जलाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन होलिका में नया अनाज अग्नि को समर्पित करने से पैदावार अच्छी होती है।
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होलिका लगाने में ध्यान रखें ये बात
जानकार बताते हैं कि होलिका लगाने में हरी लकड़ियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसमें टायर, ट्यूब, कबाड़, कूड़ा, प्लास्टिक, रबर की चीजें व जूते आदि भी नहीं डालने चाहिए। इस प्रकार की वस्तुओं का इस्तेमाल करने से वातावरण दूषित होता ही है, साथ ही पूजन आदि कार्यों में यह चीजें ठीक नहीं होती हैं।
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कैसे हुई होलाष्टक की शुरुआत
आचार्य पुत्तन लाल शुक्ल की मानें तो श्रीमद्भागवत में लिखा है कि अन्न की पैदावार होने के बाद उसका भोग भगवान को लगाना चाहिए। इसलिए इस दिन गेहूं की बालियों को गन्ने में बांधकर अग्नि को समर्पित किया जाता है। इसके अलावा एक कहावत है कि भक्तराज प्रहलाद की बुआ होलिका ने उसे अपने साथ अग्नि में बैठा लिया था। होलिका को अग्नि में न जलने का वरदान मिला था, लेकिन जब प्रहलाद बच गए और होलिका जल गई तो इससे प्रसन्न होकर लोगाें ने इस दिन होलिका दहन के रूप में मनाने लगे। इसके अलावा एक प्राचीन मान्यता यह भी है कि भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ लगातार आठ दिनों तक रंग खेला था और नवें दिन अपने वस्त्र अग्नि को समर्पित कर दिए थे, तभी से होली का त्योहार मनाया जाता है।