{"_id":"619a7f67588846078a149184","slug":"culutural-unnao-news-knp6652956116","type":"story","status":"publish","title_hn":"...हमें मालुम था एक दिन सिंकदर हार जाएगा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
...हमें मालुम था एक दिन सिंकदर हार जाएगा
विज्ञापन
बीघापुर के घाटमपुर कला में आयोजित कवि सम्मेलन में कवितापाठ करते स्वयं श्रीवास्तव। संवाद
- फोटो : UNNAO
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बीघापुर। घाटमपुर कला स्थित बाबा भूतेश्वर में पंचग्राम मेला कमेटी ने कवि सम्मेलन का आयोजन किया। कवियों ने हास्य, ओज और श्रृंगार रस की रनचाएं सुनाईं। रायबरेली से आए कवि गोविंद गजब ने ‘यहां पोरस के जैसा हौसला लेकर किसान बैठे हैं, हमें मालूम था एक दिन सिकंदर हार जाएगा’।
कवि सम्मेलन की शुरुआत नीलम कश्यप की वाणी वंदना से हुई। आकाश उमंग ने ‘कीमत और चमक को पाने की खातिर सोने को भी आग में तपना पड़ता है’ पढ़ा। स्वयं श्रीवास्तव ने पढ़ा कि ‘मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते, फिर घर से निकलना पड़ा घर के वास्ते’ पढ़कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। विश्वनाथ विश्व ने ‘लेकिन मरते-मरते उसने सम्मान, नाम का बचा लिया, कोई छू उसे नहीं पाया आजाद जिया आजाद मरा’। सुरेश फक्कड़ ने ‘राज दिल का मैं खोलता ह़ू़ं, मैं तुम्हारे कंठ से ही बोलता हूं’। प्रियंका शुक्ला ने ‘किसी बेबस को अपने घर का साया कौन देता है, दरख्तों को भला पतझड़ में छाया कौन देता है’ और राहुल वर्मा ने ‘धर्म जाति से हटकर करो कुछ काम ऐसे भी, खड़े हो तुम जहां पर बस वो हिन्दुस्तान हो जाए’ पढ़ा।
शानू बाजपेई ने ‘बुरी नजरों से हरदम बचाती मां, भूखी रहकर भी मुझको खिलाती है मां’, सुनाया। भारत सिंह सरज ने पढ़ा ‘हम तो गमले में रहकर के खिल न सके, वो तो कीचड़ मे रहकर कमल हो गए’। बाराबंकी के प्रमोद पंकज ने सुनाया ‘अक्कड़-बक्कड़ बंबे बोल, 90 डीजल 100 पेट्रोल’ सुनाकर गुदगुदाया। संचालन विश्वनाथ विश्व ने किया। देवेंद्र सिंह परिहार, भाजपा नेता आशुतोष शुक्ला, मेला कमेटी के अमरेश दीक्षित, संजय शुक्ला, भगवती सिंह, कल्लू दीक्षित, बलराम सिंह, अनूप बाजपेई मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
कवि सम्मेलन की शुरुआत नीलम कश्यप की वाणी वंदना से हुई। आकाश उमंग ने ‘कीमत और चमक को पाने की खातिर सोने को भी आग में तपना पड़ता है’ पढ़ा। स्वयं श्रीवास्तव ने पढ़ा कि ‘मुश्किल थी संभलना ही पड़ा घर के वास्ते, फिर घर से निकलना पड़ा घर के वास्ते’ पढ़कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। विश्वनाथ विश्व ने ‘लेकिन मरते-मरते उसने सम्मान, नाम का बचा लिया, कोई छू उसे नहीं पाया आजाद जिया आजाद मरा’। सुरेश फक्कड़ ने ‘राज दिल का मैं खोलता ह़ू़ं, मैं तुम्हारे कंठ से ही बोलता हूं’। प्रियंका शुक्ला ने ‘किसी बेबस को अपने घर का साया कौन देता है, दरख्तों को भला पतझड़ में छाया कौन देता है’ और राहुल वर्मा ने ‘धर्म जाति से हटकर करो कुछ काम ऐसे भी, खड़े हो तुम जहां पर बस वो हिन्दुस्तान हो जाए’ पढ़ा।
विज्ञापन
शानू बाजपेई ने ‘बुरी नजरों से हरदम बचाती मां, भूखी रहकर भी मुझको खिलाती है मां’, सुनाया। भारत सिंह सरज ने पढ़ा ‘हम तो गमले में रहकर के खिल न सके, वो तो कीचड़ मे रहकर कमल हो गए’। बाराबंकी के प्रमोद पंकज ने सुनाया ‘अक्कड़-बक्कड़ बंबे बोल, 90 डीजल 100 पेट्रोल’ सुनाकर गुदगुदाया। संचालन विश्वनाथ विश्व ने किया। देवेंद्र सिंह परिहार, भाजपा नेता आशुतोष शुक्ला, मेला कमेटी के अमरेश दीक्षित, संजय शुक्ला, भगवती सिंह, कल्लू दीक्षित, बलराम सिंह, अनूप बाजपेई मौजूद रहे।
विज्ञापन