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Sultanpur News: जहां ठहरे थे बापू, आज भी याद दिलाते हैं वो स्थान
Fri, 02 Oct 2026 12:30 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
Updated Fri, 02 Oct 2026 12:30 AM IST
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सीताकुंड स्थित केश कुटीर, जिसमें अब चलता है गनपत सहाय पीजी कॉलेज। संवाद
सुल्तानपुर। नवंबर 1929 में महात्मा गांधी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ स्वराज आंदोलन की अलख जगाने सुल्तानपुर पहुंचे थे। गोमती नदी किनारे सीताकुंड स्थित बाबू गनपत सहाय की कोठी ‘केशकुटीर’ में उन्होंने रात्रि विश्राम किया था। अगले दिन रेलवे स्टेशन के पास सेठ जगरामदास धर्मशाला में आयोजित सभा में हजारों लोग जुटे थे।
गांधीजी ने लोगों से फिरंगी हुकूमत के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन करने का आह्वान किया था। उनके आह्वान पर सेठ-साहूकारों ने स्वराज की लड़ाई के लिए चंदा दिया था। उनकी सभा में स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी ठाकुर राम नरायन, बाबू संगमलाल, राम हरख सिंह, अनंत बहादुर सिंह, भगौती प्रसाद, चंद्रबली पाठक, उमादत्त शर्मा और हरिहर सिंह भी शामिल हुए थे।
गांधीजी के सुल्तानपुर आगमन का उल्लेख मार्च 1995 में प्रकाशित पत्रिका ‘जन भारती’ के रजत जयंती अंक में मिलता है। डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव के आलेख ‘राष्ट्रीय आंदोलन में सुल्तानपुर का योगदान’ में लिखा है कि बापू को देखने और सुनने के लिए हजारों लोगों के साथ छात्र भी सभा में पहुंचे थे। साइमन कमीशन के विरोध में जनता को जागृत करने के लिए देशव्यापी दौरे के दौरान गांधीजी यहां आए थे। बाबू गनपत सहाय कांग्रेस के गरम दल के नेता और गांधीजी के करीबी माने जाते थे। वह गांधीजी के साथ उनकी कार से फैजाबाद (अब अयोध्या) से सुल्तानपुर आए थे। गांधीजी जिस ‘केशकुटीर’ में ठहरे थे, वह अब गनपत सहाय पीजी कॉलेज के राधारानी महिला विभाग में बदल चुका है। वहीं, सेठ जगरामदास धर्मशाला का आंगन आज भी बापू के सुल्तानपुर आगमन की याद संजोए है।
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इतिहासकार स्व. बाबू राजेश्वर सिंह की पुस्तक ‘सुल्तानपुर का इतिहास’ में भी गांधीजी के आगमन और सभा का विस्तृत उल्लेख है। उन्होंने लिखा है कि गांधीजी ने सेठ-साहूकारों से स्वराज की लड़ाई के लिए चंदा मांगा था और महाजनों ने उनकी झोली भर दी थी। ये स्थल आज भी सुल्तानपुर के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान की कहानी सुनाते हैं।
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गांधीजी ने लोगों से फिरंगी हुकूमत के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन करने का आह्वान किया था। उनके आह्वान पर सेठ-साहूकारों ने स्वराज की लड़ाई के लिए चंदा दिया था। उनकी सभा में स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी ठाकुर राम नरायन, बाबू संगमलाल, राम हरख सिंह, अनंत बहादुर सिंह, भगौती प्रसाद, चंद्रबली पाठक, उमादत्त शर्मा और हरिहर सिंह भी शामिल हुए थे।
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गांधीजी के सुल्तानपुर आगमन का उल्लेख मार्च 1995 में प्रकाशित पत्रिका ‘जन भारती’ के रजत जयंती अंक में मिलता है। डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव के आलेख ‘राष्ट्रीय आंदोलन में सुल्तानपुर का योगदान’ में लिखा है कि बापू को देखने और सुनने के लिए हजारों लोगों के साथ छात्र भी सभा में पहुंचे थे। साइमन कमीशन के विरोध में जनता को जागृत करने के लिए देशव्यापी दौरे के दौरान गांधीजी यहां आए थे। बाबू गनपत सहाय कांग्रेस के गरम दल के नेता और गांधीजी के करीबी माने जाते थे। वह गांधीजी के साथ उनकी कार से फैजाबाद (अब अयोध्या) से सुल्तानपुर आए थे। गांधीजी जिस ‘केशकुटीर’ में ठहरे थे, वह अब गनपत सहाय पीजी कॉलेज के राधारानी महिला विभाग में बदल चुका है। वहीं, सेठ जगरामदास धर्मशाला का आंगन आज भी बापू के सुल्तानपुर आगमन की याद संजोए है।
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इतिहासकार स्व. बाबू राजेश्वर सिंह की पुस्तक ‘सुल्तानपुर का इतिहास’ में भी गांधीजी के आगमन और सभा का विस्तृत उल्लेख है। उन्होंने लिखा है कि गांधीजी ने सेठ-साहूकारों से स्वराज की लड़ाई के लिए चंदा मांगा था और महाजनों ने उनकी झोली भर दी थी। ये स्थल आज भी सुल्तानपुर के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान की कहानी सुनाते हैं।