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आस्था का केंद्र बना देवी कालिकन धाम

Sun, 09 Oct 2016 10:21 PM IST
Amar ujala Bureau
Amar ujala Bureau Updated Sun, 09 Oct 2016 10:21 PM IST
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Kalikan Dhaam shining in Navratri
बड़ी संख्या में उमड़े भक्त - फोटो : अमर उजाला

पौराणिक महत्व को समेटे मां कालिकन धाम का ऐतिहासिक मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बना है। शारदीय व चैत्र नवरात्र में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। हर सोमवार को यहां मेला लगता है। देवी कालिकन धाम का वर्णन भागवत पुराण में भी मिलता है। 

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ब्लॉक मुख्यालय के पास स्थित मां कालिकन धाम का मंदिर प्राचीन काल से लोगों की आस्था का केंद्र बना है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक सरयू व गंगा नदी के मध्य में स्थित कालिकन धाम महर्षि च्यवन ऋषि की तपोस्थली हुआ करता था। पुरातन काल में यहां आनंदवन नामक घना व वीरान जंगल था। उसी जंगल में ही महर्षि च्यवन का आश्रम था। जनश्रुति है कि महर्षि च्यवन ने सोमयज्ञ कराया तो यहां अमृत कुंड उत्पन्न हो गया, जिससे देवता चिंतित हो गए। अमृत कुंड के रक्षार्थ देवताओं ने शक्ति की आराधना की तो देवी मां प्रसन्न हुई और अमृतकुंड की रक्षा के लिए सहर्ष तैैयार हो गईं।
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अमृतकुंड पर ही महर्षि च्यवन ने देवी मां की स्थापना की। मंदिर से जुड़े कई रोचक तथ्य आज भी लोगों से सुनने को मिलते हैं। कहा जाता है कि अमेठी के राजा लालमाधव सिंह को मां ने स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर का जीर्णोद्घार कराने को कहा था। मंदिर के पुजारी श्री महराज के अनुसार यहां पर स्थित सगरा ईसा पूर्व में ‘बारा तलिया’ के नाम से जाना जाता था। इसमें देव वैद्य अश्विनी कुमार ने औषधियों का घोल बनाया था।
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इसी बारा तलिया में स्नान करने के बाद महर्षि च्यवन को युवावस्था प्राप्त हुई थी। बताया जाता है कि बारा तलिया की खोज करते महान शासक सिकंदर भी आ पहुंचा था। उसके पहुंचने पर यह स्थान अचानक गगन भेदी तीव्र गड़गड़ाहट के साथ हिलने लगा था। भयभीत होकर सिकंदर अपनी सेना लेकर लौट गया और बारातलिया लुप्त हो गया। वर्ष 1958 में अमेठी के राजा रणवीर सिंह ने बारा तलिया की खोज के लिए विद्वानों व पंडितों से विधि पूछकर खोदाई शुरू कराई, जिसमें सांप, बिच्छू व विषैले जीव-जंतु भारी संख्या मेें निकलने लगे। कहा जाता है कि उसी रात राजा रणवीर सिंह को स्वप्न में दर्शन देकर महर्षि च्यवन ने उस स्थान की खोदाई बंद करने को कहा। स्वप्न से प्रेरित होकर राजा ने इस स्थान पर महर्षि च्यवन का मंदिर बनवा दिया। यहां महर्षि के नाम का शिलालेख भी मिला था। मंदिर के दक्षिण तरफ एक बड़े सगरे का निर्माण 1968 में स्थानीय लोगों ने करवाया। 

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