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एसएसपी की ‘चौखट’ पर शर्मसार हुई इंसानियत
मेरठ/ब्यूरो
Updated Wed, 24 Apr 2013 01:35 AM IST
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एक मां की मौत..., एक पत्नी की मौत.... और साथ ही इंसानियत की मौत। मंगलवार को एसएसपी दफ्तर के सामने ऐसा ही हुआ।
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अस्पताल में भर्ती पति के इलाज के लिए रुपयों का इंतजाम करने को उषा बाइक पर बेटे के साथ निकली थी।
एसएसपी आवास के सामने स्कूटी की टक्कर लगने से वह नीचे गिरी तो कार उसे रौंदते हुए निकल गई। लहूलुहान मां को गोद में लिए बेटा मदद की गुहार लगाता रहा, लेकिन किसी का दिन नहीं पसीजा।
दो अस्पतालों में भर्ती न किए जाने के बाद उषा ने उसी अस्पताल में दम तोड़ा, जहां पति भर्ती हैं।
मामला मंगलवार सुबह 9:30 बजे का है। मेडिकल क्षेत्र के जागृति विहार 254/2 में राजबीर सिंह का परिवार रहता है। राजबीर गांव कडीपुर मावा बागपत के मूल निवासी हैं और पराग डेरी में नौकरी करते हैं।
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18 अप्रैल को घर में आग लगने से राजबीर सिंह झुलस गए थे, तभी से वह तेजगढ़ी चौराहे के पास शिवम हॉस्पिटल में भर्ती हैं।
मंगलवार सुबह राजबीर की पत्नी उषा सिंह (52) अपने बेटे राहुल (20) के साथ पैसे का इंतजाम करने बेगमपुल की ओर जा रही थीं।
एसएसपी दफ्तर के सामने उनकी बाइक को एक स्कूटी ने साइड मार दी, जिसके चलते मां-बेटा गिर पड़े।
इसी दौरान पीछे से आई कार उषा को रौंदते हुए निकल गई। मां को लहूलुहान देखकर राहुल घबरा गया। उसने आने-जाने वालों से चीख-चीखकर मदद मांगी, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी।
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करीब 20 मिनट तक राहुल जख्मी मां को गोद में लिए एसएसपी आवास के सामने बदहवास हालत में बैठा रहा। उसने फोन पर हादसे की जानकारी परिजनों को दी।
आनन-फानन में परिजन मौके पर पहुंचे और उषा को निजी अस्पताल में ले गए। आरोप है कि डाक्टरों ने अस्पताल में बेड खाली न होने की बात कहकर उषा को भर्ती नहीं किया।
परिजन दूसरे अस्पताल पहुंचे तो वहां भी नहीं भर्ती किया गया। बाद में उसी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां राजबीर भर्ती हैं।
खून अधिक बहने के कारण डाक्टरों ने उषा को मृत घोषित कर दिया। लालकुर्ती पुलिस ने अज्ञात कार चालक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है।
अस्पतालों में मानवता की मौत
निजी अस्पतालों का हाल बहुत बुरा हो चुका है। मरीज तड़पता रहता है, लेकिन अस्पताल वालों का दिल नहीं पसीजता। दस दिन पूर्व छात्र सजल और पांच दिन पहले मुस्तकीम की मौत इसका उदाहरण है। इससे पहले भी दर्जनों मौतें अस्पताल की लापरवाही के चलते हो चुकी हैं।
नहीं निकले आंसू
उषा की मौत होने पर परिजन रोए नहीं। उन्हें डर था कि कहीं राजबीर को पता न चल जाए।
‘तुम्हारी मां नहीं आई...’
पांच दिन से उषा पति के लिए नाश्ता लेकर सुबह नौ बजे ही पहुंच रही थी। 11 बजे तक वह नहीं पहुंची तो राजबीर बार-बार बेटों से पूछते रहे कि तुम्हारी मां अभी तक नहीं आई, कहीं चली गई है क्या। राजबीर को कौन बताए कि उषा अब इस दुनिया में नहीं है।