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Sonebhadra News: ...तो सिर्फ धूल फांकने के लिए बनाए थे करोड़ों के भवन
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सोनभद्र। जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए जिला अस्पताल परिसर में करोड़ों रुपये खर्च कर बने कई भवन धूल फांक रहे हैं। कोई भवन सात साल से बनकर तैयार है तो किसी का निर्माण नौ साल पहले हुआ था। इन भवनों का लोकार्पण भी हो चुका है। महंगे उपकरण, बेड आदि होने के बाद भी उनका संचालन नहीं हो रहा। विशेष बात यह कि इन भवनों में जो सुविधाएं उपलब्ध हैं, उसी का अभाव बताकर रोजाना तीन-चार मरीज वाराणसी या निजी अस्पतालों में रेफर किए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग कर्मचारियाें की कमी को मुख्य वजह बता रहा है।
89 करोड़ से बने पांच मंजिला भवन में धूल फांक रहीं मशीनें
सपा शासन काल में मई 2016 में मातृ-शिशु अस्पताल (एमसीएच) भवन के निर्माण का शुभारंभ हुआ था। जिला अस्पताल परिसर में 89 करोड़ से बनकर तैयार पांच तल वाले भवन का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सितंबर 2019 में लोकार्पण किया। यहां करोड़ों खर्च कर 22 वेटिंलेटर, 300 बेड, एसी, आईसीयू की मशीनें लगाई गईं। इस भवन का कोरोना काल में उपयोग भी हुआ। यहां ऑक्सीजन प्लांट भी लगाया गया। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस इस अस्पताल का लाभ गर्भवतियों को नहीं मिल पा रहा। वैकल्पिक व्यवस्था के तहत 100 बेड का पीपीपी मॉडल पर एमसीएच विंग संचालित तो हैं, मगर वहां वेंटिलेटर, आईसीयू न होने के कारण मरीजों को रेफर किया जाता है। जांच के लिए भी यहां-वहां भटकना हाेता है।
आठ साल पूर्व लोकार्पण, फिर भी चालू नहीं हुआ बर्न यूनिट
जिले में आए दिन आग से जलने की घटनाएं होती हैं। प्राथमिक उपचार के बाद मरीजों को वाराणसी रेफर कर दिया जाता है। वह भी तब, जबकि यहां करोड़ों की लागत से तैयार प्लास्टिक सर्जरी एवं बर्न यूनिट बना है। पूर्ववर्ती सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव ने 1 जून 2015 को वातानुकूलित प्लास्टिक सर्जरी एवं बर्न यूनिट का लोकार्पण किया था। बड़ी तादाद में उपकरण भी खरीदे गए, मगर अब तक यूनिट को संचालन का इंतजार है। एक वर्ष पूर्व जिले में आए डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और फिर नौ माह पहले स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक ने इसके संचालन का भरोसा दिया। फिर भी शुरू नहीं हुआ। दो तल वाले बर्न यूनिट का संचालन न होने से लाखों खर्च कर लगाए गए 30 से अधिक बेड, दर्जनों एसी धूल फांक रहे हैं। बिजली संयंत्र भी खराब हो रहे हैं।
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नहीं हो सका ट्रामा सेंटर का संचालन
जनवरी 2015 में जिला अस्पताल परिसर में ट्रामा सेंटर का शिलान्यास हुआ था। दो साल में करीब 50 लाख से अधिक रुपये खर्च कर भवन तो बन गया, मगर आठ सालों से वह केवल शोपीस बना है। विभागीय अधिकारियों के आश्वासन देने के बाद भी ट्रामा सेंटर का संचालन शुरू नहीं हो सका है। ट्रामा सेंटर के चारों ओर जंगली घास और धूल जमी हुई है। मैन पावर व संसाधनों की कमी जैसे आर्थोपैडिक सर्जन, नेत्र सर्जन, ओटी टेक्नीशियन, स्टाफ नर्स, एक्स-रे टेक्नीशियन, लैब टैक्नीशियन, नर्सिंग अस्सिटेंट, मल्टी टॉस्क वर्कर्स की कमी के कारण संचालन नहीं हो सका है।
केस एक : करमा थाना क्षेत्र निवासी अनिल को दस दिन पूर्व बेटी पैदा हुई। परिजन उसे लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। उसे वेंटिलेटर की भी जरूरत थी। नवजात की स्थिति गंभीर देख उसे वाराणसी रेफर कर दिया गया। परिजन इधर-उधर भटकते रहे। बाद में उसकी मौत हो गई।
केस दो : कुछ माह पूर्व कमालडीह पहड़ी निवासी गर्भवती सुमन को पन्नूगंज निवासी मायके वाले पीपीपी मॉडल के एमसीएच विंग लेकर पहुंचे। वहां संसाधनों के अभाव में महिला को रेफर कर दिया गया। परिजन वाराणसी न जाकर रेलवे फाटक स्थित निजी अस्पताल में ले गए। वहां ऑपरेशन के बाद तबीयत बिगड़ने के बाद सुमन की मौत हो गई।
बर्न यूनिट सहित अन्य अस्पतालों के संचालन के लिए पूर्व में प्रयास किए गए मगर अस्पताल में चिकित्सकों और कर्मचारियों की कमी के कारण ये संचालित नहीं हो पा रहे हैं। -डॉ. अश्वनी कुमार,सीएमओ।
मेडिकल काॅलेज के अधीन आने के बाद इस भवनों को भी क्रमबद्ध तरीके से प्रयोग में लाते हुए संचालन शुरू कराया जाएगा। हालांकि इसके लिए अभी इंतजार करना होगा। -डॉ. एसके सिंह, प्राचार्य मेडिकल काॅलेज
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89 करोड़ से बने पांच मंजिला भवन में धूल फांक रहीं मशीनें
सपा शासन काल में मई 2016 में मातृ-शिशु अस्पताल (एमसीएच) भवन के निर्माण का शुभारंभ हुआ था। जिला अस्पताल परिसर में 89 करोड़ से बनकर तैयार पांच तल वाले भवन का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सितंबर 2019 में लोकार्पण किया। यहां करोड़ों खर्च कर 22 वेटिंलेटर, 300 बेड, एसी, आईसीयू की मशीनें लगाई गईं। इस भवन का कोरोना काल में उपयोग भी हुआ। यहां ऑक्सीजन प्लांट भी लगाया गया। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस इस अस्पताल का लाभ गर्भवतियों को नहीं मिल पा रहा। वैकल्पिक व्यवस्था के तहत 100 बेड का पीपीपी मॉडल पर एमसीएच विंग संचालित तो हैं, मगर वहां वेंटिलेटर, आईसीयू न होने के कारण मरीजों को रेफर किया जाता है। जांच के लिए भी यहां-वहां भटकना हाेता है।
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आठ साल पूर्व लोकार्पण, फिर भी चालू नहीं हुआ बर्न यूनिट
जिले में आए दिन आग से जलने की घटनाएं होती हैं। प्राथमिक उपचार के बाद मरीजों को वाराणसी रेफर कर दिया जाता है। वह भी तब, जबकि यहां करोड़ों की लागत से तैयार प्लास्टिक सर्जरी एवं बर्न यूनिट बना है। पूर्ववर्ती सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव ने 1 जून 2015 को वातानुकूलित प्लास्टिक सर्जरी एवं बर्न यूनिट का लोकार्पण किया था। बड़ी तादाद में उपकरण भी खरीदे गए, मगर अब तक यूनिट को संचालन का इंतजार है। एक वर्ष पूर्व जिले में आए डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और फिर नौ माह पहले स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक ने इसके संचालन का भरोसा दिया। फिर भी शुरू नहीं हुआ। दो तल वाले बर्न यूनिट का संचालन न होने से लाखों खर्च कर लगाए गए 30 से अधिक बेड, दर्जनों एसी धूल फांक रहे हैं। बिजली संयंत्र भी खराब हो रहे हैं।
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नहीं हो सका ट्रामा सेंटर का संचालन
जनवरी 2015 में जिला अस्पताल परिसर में ट्रामा सेंटर का शिलान्यास हुआ था। दो साल में करीब 50 लाख से अधिक रुपये खर्च कर भवन तो बन गया, मगर आठ सालों से वह केवल शोपीस बना है। विभागीय अधिकारियों के आश्वासन देने के बाद भी ट्रामा सेंटर का संचालन शुरू नहीं हो सका है। ट्रामा सेंटर के चारों ओर जंगली घास और धूल जमी हुई है। मैन पावर व संसाधनों की कमी जैसे आर्थोपैडिक सर्जन, नेत्र सर्जन, ओटी टेक्नीशियन, स्टाफ नर्स, एक्स-रे टेक्नीशियन, लैब टैक्नीशियन, नर्सिंग अस्सिटेंट, मल्टी टॉस्क वर्कर्स की कमी के कारण संचालन नहीं हो सका है।
केस एक : करमा थाना क्षेत्र निवासी अनिल को दस दिन पूर्व बेटी पैदा हुई। परिजन उसे लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। उसे वेंटिलेटर की भी जरूरत थी। नवजात की स्थिति गंभीर देख उसे वाराणसी रेफर कर दिया गया। परिजन इधर-उधर भटकते रहे। बाद में उसकी मौत हो गई।
केस दो : कुछ माह पूर्व कमालडीह पहड़ी निवासी गर्भवती सुमन को पन्नूगंज निवासी मायके वाले पीपीपी मॉडल के एमसीएच विंग लेकर पहुंचे। वहां संसाधनों के अभाव में महिला को रेफर कर दिया गया। परिजन वाराणसी न जाकर रेलवे फाटक स्थित निजी अस्पताल में ले गए। वहां ऑपरेशन के बाद तबीयत बिगड़ने के बाद सुमन की मौत हो गई।
बर्न यूनिट सहित अन्य अस्पतालों के संचालन के लिए पूर्व में प्रयास किए गए मगर अस्पताल में चिकित्सकों और कर्मचारियों की कमी के कारण ये संचालित नहीं हो पा रहे हैं। -डॉ. अश्वनी कुमार,सीएमओ।
मेडिकल काॅलेज के अधीन आने के बाद इस भवनों को भी क्रमबद्ध तरीके से प्रयोग में लाते हुए संचालन शुरू कराया जाएगा। हालांकि इसके लिए अभी इंतजार करना होगा। -डॉ. एसके सिंह, प्राचार्य मेडिकल काॅलेज