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चाहिए योजना और धन, तभी बढ़ सकेगा पर्यटन
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प्रकृति की गोद में बसे जिले की अप्रतिम सुंदरता पर निहाल होकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सोनभद्र को भारत के स्विट्जरलैंड की संज्ञा दी थी। उन्होंने इसके विकास के लिए योजनाबद्ध ढंग से काम करने पर जोर दिया था। पांच दशक बाद भी सोनांचल के पर्यटन को अलग पहचान दिलाने के लिए न तो कोई योजना बनी और न ही धन मिल सका। नेताओं की उदासीनता का ही असर है कि असीम संभावनाओं के बावजूद यहां का पर्यटन उद्योग गति नहीं पकड़ पा रहा। पर्यटन स्थलों पर सफाई, पेयजल, सुरक्षा और शेड जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पर्यटक यहां से मुंह मोड़ रहे हैं।
चार राज्यों की सीमाओं से सटा यह जिला प्रदेश को राजस्व देने के मामले में सबसे आगे हैं। घने जंगलों और पहाड़ों के बीच प्रचुर खनिज पदार्थ प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहे हैं तो रिहंद जलाशय से जुड़े करीब 20 हजार मेगावाट की क्षमता वाले पावर प्लांट पूरे देश को रोशन कर रहे हैं। घने जंगल और पहाड़ों के बीच यहां अनेक ऐसे स्थल हैं, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। बारिश के दिनों में हरियाली से सराबोर घाटियों में प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता को निहारने पूरे पूर्वांचल से लोग यहां पहुंचते हैं। मुक्खा फाल, अबाड़ी मिनी गोवा, जोरकहू, खंता पिकनिक स्पाट, रिहंद, धंधरौल, नगवां व ओबरा बांध के किनारे पर्यटक मौज मस्ती करते देखते जाते हैं तो सलखन स्थित दुनिया के सबसे पुराने फासिल्स पार्क में पहुंचकर जीवन के इतिहास के समझते हैं। चंद्रकांता की तिलिस्मी वादियां उन्हें आकर्षित करती हैं तो महुअरिया के जंगलों में काले हिरनों को कुलांचे भरते देख मन रोमांचित हो उठता है। जिले में ऐसे दर्जनों स्थल है, जो पर्यटन के लिहाज से काफी अहम हैं। आदिवासी बहुल जिले को यह पर्यटन स्थल रोजगार, व्यापार और विकास की नई राह पर ले जाने के लिए काफी मुफीद हैं। विडंबना है कि पर्यटन के नक्शे पर इन्हें अब तक समुचित पहचान नहीं मिल पाई है। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता इसकी मुख्य वजह रही है। आसपास के अन्य जिलों में कम महत्व वाले कई स्थल पर पर्यटकीय सुविधाओं के लिहाज से काफी आगे निकल गए जबकि प्रकृति के नैसर्गिक सुंदरता की समृद्ध थाती होने के बाद भी सोनांचल के पर्यटन स्थल पिछड़ गए। इस बार के चुनावों में लोग पर्यटकीय विकास को भी मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
इन सुविधाओं की दरकार
जिले के पर्यटन स्थलों पर अब तक बुनियादी सुविधाएं ही विकसित नहीं की जा सकी हैं। दूरदराज से लोग जब इन स्थलों पर पहुंचते हैं तो वहां गंदगी और दुर्व्यवस्था देख नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। पर्यटन स्थलों पर शुद्ध पेयजल, शौचालय, बेंच, शेड का अभाव है। घने जंगलों में होने के कारण ज्यादातर स्थानों पर नेटवर्क सुविधा भी नहीं है, जिसके चलते वहां शरारती तत्व भी सक्रिय रहते हैं। कई बार अप्रिय घटनाएं भी हो चुकी हैं। पर्यटन स्थलों तक जाने के लिए अच्छी सड़कों का अभाव है तो उनके बारे में बताने वाले साइनेज भी नहीं लगाए गए हैं।
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आकर्षण का केंद्र है यह पर्यटक स्थल
सोन इको प्वाइंट, सोन पंप कैनाल, मिनी गोवा अबाड़ी, जोरकहू और खंता पिकनिक स्पाट, हाथीनाला बायो डायवर्सिटी पार्क, डाला और रेणुकूट के मंदिर, विजयगढ़ स्थित चंद्रकांता किला, मऊ का पुरातात्विक संग्रहालय, धंधरौल और नगवां बांध, सलखन का फासिल्स पार्क, महुअरिया की ब्लैक बक घाटी, सोन इको वैली, मुक्खा फाल, कंडा कोट, पंचमुखी पहाड़ी आदि।
सोनभद्र जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास चल रहा है। इसी के तहत लोढ़ी में टूरिस्ट बंगला बनाने के लिए जगह चिह्नित की जा चुकी है। कुछ स्थानों पर मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्द्धन योजना के तहत कार्य भी हुए हैं। आगे भी योजना तैयार कर पर्यटकीय सुविधाओं के विकास के लिए कार्य कराए जाएंगे। -कीर्तिमान श्रीवास्तव, क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी।
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चार राज्यों की सीमाओं से सटा यह जिला प्रदेश को राजस्व देने के मामले में सबसे आगे हैं। घने जंगलों और पहाड़ों के बीच प्रचुर खनिज पदार्थ प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहे हैं तो रिहंद जलाशय से जुड़े करीब 20 हजार मेगावाट की क्षमता वाले पावर प्लांट पूरे देश को रोशन कर रहे हैं। घने जंगल और पहाड़ों के बीच यहां अनेक ऐसे स्थल हैं, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। बारिश के दिनों में हरियाली से सराबोर घाटियों में प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता को निहारने पूरे पूर्वांचल से लोग यहां पहुंचते हैं। मुक्खा फाल, अबाड़ी मिनी गोवा, जोरकहू, खंता पिकनिक स्पाट, रिहंद, धंधरौल, नगवां व ओबरा बांध के किनारे पर्यटक मौज मस्ती करते देखते जाते हैं तो सलखन स्थित दुनिया के सबसे पुराने फासिल्स पार्क में पहुंचकर जीवन के इतिहास के समझते हैं। चंद्रकांता की तिलिस्मी वादियां उन्हें आकर्षित करती हैं तो महुअरिया के जंगलों में काले हिरनों को कुलांचे भरते देख मन रोमांचित हो उठता है। जिले में ऐसे दर्जनों स्थल है, जो पर्यटन के लिहाज से काफी अहम हैं। आदिवासी बहुल जिले को यह पर्यटन स्थल रोजगार, व्यापार और विकास की नई राह पर ले जाने के लिए काफी मुफीद हैं। विडंबना है कि पर्यटन के नक्शे पर इन्हें अब तक समुचित पहचान नहीं मिल पाई है। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता इसकी मुख्य वजह रही है। आसपास के अन्य जिलों में कम महत्व वाले कई स्थल पर पर्यटकीय सुविधाओं के लिहाज से काफी आगे निकल गए जबकि प्रकृति के नैसर्गिक सुंदरता की समृद्ध थाती होने के बाद भी सोनांचल के पर्यटन स्थल पिछड़ गए। इस बार के चुनावों में लोग पर्यटकीय विकास को भी मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
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इन सुविधाओं की दरकार
जिले के पर्यटन स्थलों पर अब तक बुनियादी सुविधाएं ही विकसित नहीं की जा सकी हैं। दूरदराज से लोग जब इन स्थलों पर पहुंचते हैं तो वहां गंदगी और दुर्व्यवस्था देख नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। पर्यटन स्थलों पर शुद्ध पेयजल, शौचालय, बेंच, शेड का अभाव है। घने जंगलों में होने के कारण ज्यादातर स्थानों पर नेटवर्क सुविधा भी नहीं है, जिसके चलते वहां शरारती तत्व भी सक्रिय रहते हैं। कई बार अप्रिय घटनाएं भी हो चुकी हैं। पर्यटन स्थलों तक जाने के लिए अच्छी सड़कों का अभाव है तो उनके बारे में बताने वाले साइनेज भी नहीं लगाए गए हैं।
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आकर्षण का केंद्र है यह पर्यटक स्थल
सोन इको प्वाइंट, सोन पंप कैनाल, मिनी गोवा अबाड़ी, जोरकहू और खंता पिकनिक स्पाट, हाथीनाला बायो डायवर्सिटी पार्क, डाला और रेणुकूट के मंदिर, विजयगढ़ स्थित चंद्रकांता किला, मऊ का पुरातात्विक संग्रहालय, धंधरौल और नगवां बांध, सलखन का फासिल्स पार्क, महुअरिया की ब्लैक बक घाटी, सोन इको वैली, मुक्खा फाल, कंडा कोट, पंचमुखी पहाड़ी आदि।
सोनभद्र जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास चल रहा है। इसी के तहत लोढ़ी में टूरिस्ट बंगला बनाने के लिए जगह चिह्नित की जा चुकी है। कुछ स्थानों पर मुख्यमंत्री पर्यटन संवर्द्धन योजना के तहत कार्य भी हुए हैं। आगे भी योजना तैयार कर पर्यटकीय सुविधाओं के विकास के लिए कार्य कराए जाएंगे। -कीर्तिमान श्रीवास्तव, क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी।