सोनभद्र। देश के अति पिछड़े और आदिवासी बहुल जिले की तस्वीर अब बदलने लगी है। बेटियों के जन्म पर यहां लोग अब छाती नहीं पीटते, बल्कि थाली बजाते हैं। लड़कियों के प्रति इस बदली सोच का ही असर है कि जिले के लिंगानुपात में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। करीब पांच वर्ष पहले तक यहां एक हजार पुरुषों पर 936 महिलाएं थीं। अब यह अनुपात बढ़ कर 995 हो गया है। पुरुषों की बराबरी से वह अब महज पांच कदम दूर हैं। अफसर इसे ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान और जागरुकता कार्यक्रमों का असर मान रहे हैं। केंद्र सरकार के परिवार और कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट जारी कर दी है। रिपोर्ट में जिले ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतरीन प्रगति की है। 2015-16 में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 की रिपोर्ट से तुलना करें तो कई क्षेत्रों में यह सुधार काफी बेहतर है। सिर्फ लिंगानुपात ही नहीं बढ़ा है, बल्कि जन्म लेने वाले बच्चों में भी लड़कियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। पहले यह अनुपात 946 का था, जो अब बढ़कर 974 तक पहुंच गया है। गर्भावस्था के दौरान टीकाकरण, जांच, आयरन की गोली के सेवन, संस्थागत प्रसव, शिशु के टीकाकरण, छह वर्ष की आयु के बालिकाओं के स्कूल में पंजीकरण सहित अन्य क्षेत्रों में पहले की अपेक्षा निरंतर सुधार हुआ है। स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार इसके लिए नियमित मॉनिटरिंग व निरंतर चल रहे जागरुकता कार्यक्रमों को श्रेय दे रहे हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य कर्मचारियों की मेहनत और मातृ-शिशु ट्रैकिंग व्यवस्था से भी हालात में बदलाव आए हैं। सर्वे रिपोर्ट पर गौर करें तो स्कूलों में लड़कियों के पंजीकरण के आंकड़ों में भी वृद्धि है। पिछले सर्वे में छह वर्ष या इससे अधिक उम्र की 59.8 प्रतिशत लड़कियों का ही स्कूलों में पंजीकरण होता था। अब यह 62.1 प्रतिशत लड़कियां स्कूल में पंजीकृत हो रही हैं। दस वर्ष और उससे अधिक समय तक स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों का प्रतिशत 28.9 से बढ़कर 35.7 तक पहुंचा है। यही नहीं पांच वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के जन्म पंजीकरण का प्रतिशत भी बढ़कर 54.6 से 82.6 हो गया है। पहले सिर्फ 54.6 प्रतिशत बच्चों का ही जन्म पंजीकृत होता था, जबकि अब 82.6 प्रतिशत जन्म पंजीकरण हो रहा है। जिले के आदिवासी क्षेत्रों में कम उम्र में ही लड़कियों के विवाह की चलन रहा है। अब इसमें तेजी से गिरावट आई है। 2015-16 में हुए सर्वे के दौरान 20-24 वर्ष आयु की करीब 33 प्रतिशत लड़कियां ऐसी थी, जिनका विवाह 18 से कम उम्र में ही कर दिया गया था। नए सर्वे में यह आंकड़ा घटकर 17.7 प्रतिशत रह गया है। महज 15-19 वर्ष की आयु में ही मां बनने या गर्भधारण करने वालों की संख्या में भी सुुधार हुआ है। संस्थागत प्रसव 57.4 से बढ़कर 77 प्रतिशत तक पहुंच गया है। सीएमओ डॉ. नेम सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ें जारी हुए हैं। जिले में लिंगानुपात की स्थिति सुधरी है। जन्म लेने वाले बच्चों में भी लड़कियों की संख्या में वृद्धि हुई है। यह जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी का सूचक है। ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मेहनत से घर-घर तक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ पहुंच रहा है।