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संतोष सबसे बड़ा धन है: सुदामा

Sat, 02 Jan 2021 12:20 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 02 Jan 2021 12:20 AM IST
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The greatest wealth is satisfaction: Sudama
नेरी (सीतापुर)। मनुष्य स्वयं को भगवान बनाने के बजाय प्रभु का दास बनने का प्रयास करे क्योंकि भक्ति भाव देखकर जब प्रभु में वात्सल्य जागता है तो वह सब कुछ छोड़कर अपने भक्त रूपी संतान के पास दौड़े चले आते हैं। गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है जबकि संत सद्भाव में जीता है। यदि संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ। संतोष सबसे बड़ा धन है।
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विकास खंड पिसावां के छहेलिया गांव में महादेव बाबा स्थान पर चल रही भागवत कथा में नैमिष पीठ से पधारे आचार्य सुदामा महराज ने ये बातें कहीं। कथावाचक आचार्य सुदामा महराज ने कथा के दौरान श्रीकृष्ण एवं सुदामा की मित्रता के बारे में बताया कि सुदामा के आने की खबर पाकर किस प्रकार श्रीकृष्ण दौड़ते हुए दरवाजे तक गए थे। ‘पानी परात को हाथ छूवो नाहीं, नैनन के जल से पग धोये...’।
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श्रीकृष्ण अपने बाल सखा सुदामा की आवभगत में इतने विभोर हो गए कि द्वारका के नाथ हाथ जोड़कर और अंग लिपटाकर जल भरे नेत्रों से सुदामा का हालचाल पूछने लगे। उन्होंने बताया कि इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मित्रता में कभी धन-दौलत आड़े नहीं आती। इस मौके पर मुख्य यजमान थानेदार मौर्य, आशाराम, रमेश मौर्य, हीरालाल, पारस, महेंद्र, पप्पू, प्रेम वर्मा, सुनील शुक्ल, बंटी सिंह, अजय सिंह व सतगुरु आदि मौजूद रहे।
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